शुक्रवार, 6 जून 2008

जनप्रिय बागी

अपनी तमाम ऊंचनीच के बावजूद इस दौर के बागी जनप्रिय थे। अंग्रेजी कुशासन कुशासन और अव्यवस्था के खिलाफ लक्ष्यहीन और बहुत हद तक निजी ही सही उनकी बगावत बहुसंख्यक उत्पीड़ित जनता की प्रतिध्वनि ही थी। बागी मानसिंह के समाकालीन मुरैना जिले की पोरसा तहसील के गांव नगला के लाखनसिंह की लोकप्रियता तो इतनी अधिक फैल गई थी कि लोगों ने उन पर लंगुरिया (लोकगीत) तक बना लिए थे। जैसे-
नगरा के लाखनसिंह लगुंरिया।
तखत हिलाए दओ दिल्ली को।
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http://beehad.blogspot.com

2 टिप्‍पणियां:

हरिमोहन सिंह ने कहा…

हम तो आ गये है बीहड में । देखे क्‍या क्‍या होता है
वर्ड वेरीफिकेशन हटा दीजिये

yogesh ने कहा…

तकनीकी तौर पर कमजोर हूं। वर्ड वेरीफिकेशन कैसे हटाया जाता है मैं नहीं जानता कृपया सहायता करें।