रविवार, 21 अप्रैल 2013

बीहड़ में फिर धूलिया

बीहड़ में फिर धूलिया
तिग्मांशु धूलिया एक बार फिर बीहड़ में उतर गए हैं। तिग्मांशु यानी वही पान सिहं तोमर वाले। राष्ट्रीय पुरस्कार से उत्हासित धूलिया बीहड़ की कथावस्तु लेकर एक और फिल्म बना रहे हैं। बुलेट राजा नाम की इस फिल्म की शूटिंग के लिए वह बीते दिन इटावा के चकरनगर इलाके में थे। बहुंत मन था तिग्मांशु से मिलने का, लेकिन व्यस्तता के कारण ऐसा नहीं हो सका। तिग्मांशु ने पहले पान सिंह तोमर और अब बुलेट राजा पर फिल्म बनाकर बीहड़ के दो कालखंडों को छू लिया। पानसिंह तोमर (1970-1990) के बीच में बीहड़ के मिजाज, वहां के हालात की कहानी है तो बुलेट राजा देश में खुली अर्थव्यवस्था आने के साथ फैले बाजारवाद के बाद बीहड़ में घुसते अपहरण उद्योंग के बाजार की कहानी है।  इस तरह मैने अपने अध्ययन में बीहड़ को जिन तीन कालखंडों बागी(1920-1950), डकैत (1950-1980), दस्यु या लुटेरे (1980-अब तक) में बांटा है उसमें तिग्मांशु अंतिम दो कालखंड को सिल्वर स्क्रीन पर उतार चुके हैं। मैरी हार्दिक इच्छा थी कि तिग्मांशु से मिलता और उनसे बागी सन्यासी पर फिल्म बनाने का सुझाव देता। मगर ऐसा हो नहीं सका। आगे फिर कभी मौका मिले....

मंगलवार, 19 मार्च 2013

पान सिंह के हिस्से सिर्फ पदक ही आए

बागी होने से दो साल पहले पान सिंह द्वारा गांव में बनवाया गया मंदिर।

आज भी ऐसी हैं भिडौसा गांव की गलियां

भिडौसा स्थित पान सिंह तोमर का घर

पान सिंह तोमर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की घर सुन गांव में इकट्ठे हुए लोग।

पान सिंह के बहाने बीहड़ एक बार फिर चर्चा में है। बाधा दौड़ के सात बार राष्ट्रीय चैंपियन रहे पान सिंह के जीवन पर बनी तिग्मांशू धूलिया की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’को इस बार सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फिल्म का पुरस्कार मिला है और इस फिल्म में पान सिंह की •ाूमिका नि•ााने वाले इरफान खान को सर्वश्रेष्ठ अ•िानेता चुना गया है। फौजी से डकैत बने इस शख्स की कहानी है ही इतनी स्तब्ध कर देने वाली। बीहड़ को न समझने वालों के लिए यह विस्मय से •ारा जीवन है तो बीहड़ वालों के लिए ‘बागी’ होने की सच्चाई। चंबल के बीहड़ जिन डकैतों के लिए मशहूर हैं उसी चंबल का इलाका अपने जाबाज फौजियों के लिए •ाी जाना जाता है। मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के क्वारी नदी के बीहड़ में बसे अति पिछड़े गांव •िाड़ौसा में जन्में पान सिंह का जीवन मनुष्य के आत्मसम्मान और उसके गौरव से जीने की कहानी है। फौज में •ार्ती होने से पहले पान सिंह की काबिलियत को न तो गांव वाले जानते थे और न स्वयं पानसिंह। 1950 और 1960 में बाधा दौड़ के चैंपियन बनने और 1958 में एशियन खेलों में हिस्से लेने तक •ाी उनकी ख्याति और कहानी ऐसी नहीं थी कि उस पर फिल्म बन सके। बीहड़ को •ाुनाने और उसे पर्दे पर उतारने वालों के लिए बीहड़ सदा से ही दिलचस्प विषय रहा है। मगर अगर पान सिंह डकैत न होते तो शायद ही राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सफलता या काबिलियत के कोई मायने होते।
हालांकि, पानसिंह जिन परिस्थितियों में डकैत बने वह बीहड़ के लिए कोई अनोखी बात नहीं थी। 70 के दशक तक इस इलाके में डकैत को ‘बागी’ कहने का ही चलन था। यानी वह शख्स जो व्यवस्था से परेशान होकर उसका विरोध करता है। इस दशक में बीहड़ में कई और नामी डकैत मलखान सिंह, मोहर सिंह, माखन सिंह, माधो सिंह •ाी थे और इनके डकैत बनने के पीछे •ाी कमोबेश वही कारण थे जिन्होंने पान सिंह को डकैत बनने के लिए मजबूर किया। पान सिंह को बागी कहें या डकैत इस परंपरा से अगर कोई चीज उन्हें अलग करती है तो वह है मनुष्यता के लिए उनका लगातार संघर्ष। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर उनकी वह उपलब्धियां जो शायद किसी अन्य डकैत में नहीं थी। हालांकि घनश्याम बाबा पान सिंह से कहीं अधिक पढ़े लिखे थे तो मान सिंह ने अधिक कष्ट उठाए थे। माखन और मलखान सिंह को पान सिंह से अधिक अपमानित होना पड़ा था और मुरैना इलाके में मशहूर डकैत घनश्याम अधिक चमत्कारिक। घनश्याम डकैत खड़े ऊंट पर बिना किसी के सहारे चढ़ जाते थे और उस समय जिन इलाकों में उन्होंने डकैती डाली वह जानते हैं कि वह क•ाी जमीन न पर चलकर मकान से मकान ही चलते थे। फुर्तीले इतने गजब के कि अगर उन्हें मौका मिला होता तो वह बांसकूद या ऊंची कूद के राष्ट्रीय चैंपियन तो अवश्य ही होते। पानसिंह ने डकैत बनने के बाद •ाी क•ाी कोई जघन्य कांड नहीं किया। यहां तक कि अपने •ातीजे बलवंत को •ाी उसने आठ गुर्जरों को मारने से रोका था।
डकैतों के जीवन पर पहली बार कोई फिल्म नहीं बनी है। इससे पहले पुतली बाई और मोहर सिंह-माधो सिंह के जीवन को लेकर •ाी फिल्म बनाई जा चुकी हैं, लेकिन जो शोहरत और सफलता पान सिंह तोमर की फिल्म को मिली वह दरअसल पानसिंह के जीवन और उनके संघर्ष की सफलता है। हां, बीहड़ पर फिल्म बनाकर •ाले ही तिग्मांशू धूलिया ने पानसिंह के जीवन को चर्चा में ला दिया हो लेकिन न तो इससे बीहड़ का कुछ •ाला होने वाला है और न ही पान सिंह के उस परिवार का जो आज •ाी बेहतर स्थिति में नहीं है। पान सिंह के पुत्र ने तो तिग्मांशू पर कुछ आरोप •ाी लगाए थे और उनकी विधवा पत्नी झांसी में सामान्य सा जीवन गुजारती है। पान सिंह का गांव •िाडौसा आज •ाी उतना ही उजड्ड और पिछड़ा हुआ है। आखिर पान सिंह और उसके गांव को ‘पदक’के सिवा मिला ही क्या है। हालांकि तिग्मांशू की यह फिल्म इस क्षेत्र के जीवन और उसकी कठिनाई को अधिक वास्तवित तौर पर पर्दे पर उतारने में सफल रही है। जैसा कि पत्रकारिता में शोध कार्य कर रहे और ग्वालियर के पत्रकार •ाुवनेश तोमर कहते हैं कि इस फिल्म ने पान सिंह के संघर्ष और इस इलाके की कठिनाई को नए तरीके से सबसे सामने रखा है। यह फिल्म इस इलाके की बदनामी करती हुई नहीं लगती बल्कि एक बार फिर सोचने को मजबूर कतकी है कि यहां हालात ऐसे क्यों हैं।

सोमवार, 4 फरवरी 2013

दस्यु रमेश सिकरवार का सरेंडर


 दो किसानों की हत्या करने के बाद एक साल से फरार चल रहे पूर्व दस्यु रमेश सिकरवार ने मध्यप्रदेश के श्योपुर जिला कलक्टर के सामने समर्पण कर दिया है। अपने फरारी के दिन जंगल के अलावा भोपाल के गांधी आश्रम में भी बिताए। यहीं उसकी मुलाकात एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजगोपाल पीवी से हुई। राजगोपाल ने ही उसे सरेंडर करने का सुझाव दिया। उसके बाद सोमवार को रमेश ने श्योपुर एसपी डॉ. एमएस सिकरवार के सामने सरेंडर कर दिया। एक साल पूर्व दस्यु रमेश सिकरवार का जमीन को लेकर कैमारा गांव के किसान काशीराम और कल्ला रावत से झगड़ा हुआ था। विवाद से गुस्साए रमेश ने दोनों किसानों की गोली मारकर हत्या कर दी और फरार हो गया। कुछ महीने कराहल के जंगल में रहने के बाद रमेश राजस्थान व उत्तरप्रदेश में अपने रिश्ते-नातेदारों के यहां चला गया था। इधर-उधर भटकने से परेशान होकर करीब दस महीने पहले वह भोपाल पहुंचा और वहां गांधी आश्रम में रहने लगा। यहीं उसकी मुलाकात राजगोपाल पीवी और एकता परिषद के अन्य पदाधिकारियों से हुई। गांधी आश्रम में ही रमेश सिकरवार ने सरेंडर करने की बात श्री राजगोपाल के समक्ष रखी थी।

बुधवार, 26 सितम्बर 2012

कृष्णा मिश्रा की नई फिल्म का टाइटल मेरे ब्लॉग से

' वुंडेड' फेम फिल्म निर्देशक कृष्णा मिश्रा अब नई फिल्म लेकर आ रहे हैं। निर्भय गुर्जर के जीवन पर बनी इस फिल्म का ' बीहड़ ' रखा गया है। यह तो मेरे ब्लॉग का नाम है। कृष्णा ने ऐसा क्यों किया है और क्या यह चोरी नहीं है। इस पर कानूनी सलाहकारों से मशविरा कर में अगला कदम उठाउंगा। यह फिल्म निर्भय सिंह गुज्जर की सच्ची कहानी पर  आधारित है और इस फिल्म में डाकू मान सिंह खुद अपनी भूमिका निभा रहे हैं. हाल ही में फिल्म के सिलसिले में  डाकू मान  सिंह दिल्ली आए और मीडिया से रुबरु हुऐ. फिल्म में फूलन देवी का किरदार निभा रही दीपिका शर्मा भी उनके साथ मौजूद  थीं.  इस फिल्म में कृष्णा ने बीहड़ के रियल मुद्दों को उठाया है, उम्मीद है कि दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ पाएगी।

फिल्म की कहानी डाकू मान सिंह के डाकू बनने पर आधारित है. कृष्णा मिश्रा से पूछने पर कि डाकू मान सिंह के लिए उन्होंने  मान सिंह से ही क्यों संपर्क किया, इस पर उनका जवाब था, मैं चाहता था कि कोई रियल किरदार ही डाकू मान सिंह की  भूमिका में दिखे. इसलिए मैंने सोचा कि डाकू मान सिंह से बेहतर विकल्प दूसरा कोई हो नहीं सकता. इसी विश्वास से साथ  जब मैंने उनसे संपर्क किया और फिल्म के बारे में बताया और साथ ही इच्छा जाहिर की कि वही इस फिल्म में काम करें तो  वह तुरंत तैयार हो गए. इससे अच्छी बात मेरे लिए और क्या हो सकती थी कि खुद डाकू मान सिंह अपना किरदार निभाएं.

अब क्वारी का बीहड़ भी बेचने की तैयारी



विकास का ख्वाब दिखाकर सरकारें हमारे पैरों की जमीन भी खींचे ले रही है। मुरैना जिले में चंबल के बीहड़ की लाखों हेक्टेयर जमीन निजी कंपनियों के हवाले करने के बाद मध्यप्रदेश की सरकार अब भिंड जिले में फैले क्वारी के बीहड़ में औद्योगिक विकास के सपने दिखा बेचने की तैयारी में है।
चंबल-क्वारी नदी के किनारे बीहड़ों की जमीन का औद्योगिक उपयोग करने के लिए उसने भिंड जिले में 119 हैक्टेयर और मुरैना में 414 हैक्टेयर जमीन तय कर ली है। अगले महीने इंदौर में होने जा रही ग्लोबल इनवेस्टर्स मीट में आमंत्रित औद्योगिक घरानों को इन बीहड़ों में उद्योग लगाने का न्योता दिया जाएगा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जल्द ही सरकार के आला अफसरों के साथ इन बीहड़ों का हवाई मुआयना करने वाले हैं।
चंबल संभाग में दिल्ली-मुंबई इंड्रस्ट्रियल कॉरीडोर (डीएमआरसी) का प्रोजेक्ट केंद्र सरकार में विचाराधीन है।
जमीन बरही के पास एनएच-92 के किनारे है। सड़क होने से उद्योगों को लाभ होगा।
ग्वालियर और इटावा से नजदीकी का लाभ भी भिंड को मिलेगा। मालनपुर में तो पहले से उद्योग लगे हुए हैं।
क्वारी, चंबल व दूसरी नदियों के कारण यहां पानी भी भरपूर है।
इटावा रेल लाइन परियोजना पर भी काम चल रहा है।
रोजगार की दृष्टि से भिंड में युवाओं की कमी नहीं है। कंपनियों को सस्ता श्रम भी यहां मिल सकेगा।


एक लाख हेक्टेयर में है बीहड़

भिंड जिले में तकरीबन एक लाख हेक्टेयर जमीन पर बीहड़ हैं। इसमें से अधिकतर जमीन चंबल, क्वारी व सिंध नदी के आसपास है। यह जमीन अनुपयोगी है। इसमें सिर्फ कटीली झाड़ियां ही उगती हैं।

शनिवार, 22 सितम्बर 2012

बीहड़ में फिर से फरमान सुनाने की तैयारी ?

बीहड़ में डकैत रामवीर गुर्जर (फाइल फोटो)।
रेनू यादव


 





चम्बल के कटीले जंगलों से डर रही है रेनू यादव , मगर पूर्व डाकू रामवीर चाहता है की रेनू फिर से उठाये असलहा और कूदे बीहड़ में / 
डाकुओं को "इष्टदेव" के रूप में पूजने वाले नेताओं की इसमें कोई चाल तो नहीं ?

देश की दिशा और दशा तय करने वाले  "राजनेता " दिल्ली में बैठकर सरकार की उम्र के आकलन के 
साथ  लोक सभा चुनाव की तैयारी में लग गए हैं तो दिल्ली से सैकड़ों मील दूर चम्बल और पाठा के डाकू 
भी आगामी लोक सभा चुनाव में अपनी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उपस्थिति की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं 
/ उनको पता है की इस इलाके  में होने वाले चुनाव में उनकी थोड़ी सी भागीदारी उन्हें बड़ा इनाम दिला 
सकती है लिहाजा इस मौके को वह भुनाने की पूरी कोशिस में जुट गये हैं / चुनाव के दरम्यान कई बार 
इस इलाके के नेताओं के बीच "इष्टदेव" के रूप में पूजे जा चुके चम्बल और पाठा के डकैत अपनी नयी 
योजना की सफलता की तैयारी में उतनी ही सिद्दत के साथ लगे हैं जितना चुनाव लड़ने के लिए नेता / 
  चंबल के कुख्यात डकैत निर्भय गुर्जर , रज्जन गुर्जर , सलीम , और  और पाठा के   ददुआ, ठोकिया और 
रागिया की मौत के बाद कुछ समय के लिए चंबल और पाठा की  घाटी शांत हो गई थी, २०१२ में हुए 
यू.पी. अस्सेम्बली के चुनाव में डाकुओं के फरमान के बगैर जब चुनाव हुआ तो बीहड़ी इलाके की जनता 
ने भी बिना  किसी डर के दिल खोल कर मतदान क्या / लेकिन लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही डकैतों 
के कदमों की आहट फिर से सुनाई देने लगी है /.बीहड़ी सूत्रों के मुताबिक़  राजनीतिक आकाओं ने उन्हें 
फिर से बढ़ावा देना शुरू कर दिया है / .पाठा में  रागिया गिरोह की कमान संभालकर बलखंडिया पटेल ने
 आतंक का नया अध्याय शुरू कर दिया है / . डकैतों के रहमो-करम पर सांसद-विधायक बनने वाले 
सफेदपोशों ने भी बलखंडिया को ददुआ और ठोकिया की तरह 'ईष्ट' मान लिया है / जो जानकारी मिली है 
उसके मुताबिक़  पिछले माह चित्रकूट की अदालत में  पेशी के बाद   बांदा जाते समय पुलिस हिरासत से 
भागे 13 डकैत भी उसके गिरोह में शामिल हो गए हैं./  दूसरी तरफ, देश की आतंरिक और वाह्य सुरक्षा के
 लिए  कभी पंजाब में तैनात रहा सीआरपीएफ का सिपाही राम चन्द्र अब स्वयं अमन पसंद जनता के 
लिए ख़तरा बन गया है /  फौजी  रामचंद्र यादव भी चंबल में आ धमका है./  उसका गिरोह भी तेजी से 
अपना प्रभाव बढ़ाता जा रहा है./ सैकड़ों किलोमीटर की परिधि में फैले चम्बल के बीहड़ में रामचंद्र की 
चहल कदमी निर्द्वंद जारी है /  रामचंद्र ने बीहड़ में मारे जा चुके डाकुओं के गिरोह के बचे हुए डकैतों से 
संपर्क साधा और धीरे-धीरे उन्हें अपने साथ मिला लिया. आज उसके गैंग में 10-12 डकैत  हैं, जिनके 
पास अत्याधुनिक हथियार भी है./ इसके अलावा जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे अरविन्द 
गुर्जर के गिरोह ने बाहर खुली हवा में सांस ले रही पूर्व दस्यु सुंदरी रेनू यादव को एक बार फिर से चम्बल 
के बीहड़ों में भेजने और उसके गैंग के बचे डाकुओं की कमान सम्हालने की धमकी दे रहा है / रेनू यादव अपनी सुरक्षा की गुहार प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर कर चुकी है / रेनू का कहना है की चम्बल में डाकुओं के अंत की कहानी उसी के गिरोह से शुरू हुयी / ४ दिसंबर २००५ की रात उसे अच्छी तरह से याद है / औरैया जिले के मई गाँव के जंगलों में डाकू चन्दन यादव अपनी दस्यु सुंदरी रेनू यादव और गिरोह के अन्य सदस्यों के साथ आराम कर रहा था / तभी उस वक्त का सबसे खूंखार डाकू रामवीर गुर्जर अपने साथी डकैतों के साथ वहाँ आ धमका / दरअसल वह चाहता   था की  रेनू यादव चन्दन यादव  का साथ छोड़  कर उसकी  हमराह  बने  मगर  यह  ना  तो  चन्दन को पसंद  था और ना  ही  रेनू इससे सहमत  हुयी / रामवीर जानता  था की चन्दन के जीते  जी  वह  रेनू को नहीं  पा  सकता  / राम  वीर  ने  ६  घंटे  से अधिक  समय  तक  फायरिंग  कर चन्दन को मई के जंगलों में मार  गिराया  लेकिन  रेनू फिर भी  रामवीर  के गिरोह में शामिल नहीं हुयी / रेनू ने रामवीर की बन्दूक छीनकर उसको गोली मारकर लहूलुहान कर दिया और जंगल से भाग आई / रेनू के इस कदम से रामवीर गुर्जर बौखला गया और उसने अगले ही दिन चन्दन गिरोह के तीन अन्य सदस्यों को कैथौली के जंगलों में मारकर फेंक दिया / डाकुओं के बीच लगातार शुरू हुए गैंगवार का फायदा पुलिस ने उठाना शुरू किया / आखिर कार डाकुओं की दरिंदगी से परेशान बीहड़ की जनता पुलिस की सहायता के लिए आगे आई और चम्बल के ज्यादातर डाकू या तो पुलिस की गोलियों के शिकार हुए या फिर जान बचाने के लिए सरेंडर कर दिए / २०१२ में हुआ असेम्बली का चुनाव डाकुओं बगैर किसी फरमान के संपन्न हो गया / राज्य के अन्य हिस्सों की तरह यहाँ की जनता ने भी जागरूकता दिखाई और जमकर मतदान किया वह भी बिना किसी डर और भय के / यहाँ की जनता को लगा की डाकुओं का फरमान अब इतिहास बन चुका है और भविष्य उनका है जिसमे वह अपने पसंद का प्रतिनिधि चुनकर अपने इलाके के विकास की नयी इबारत लिखेंगे / लेकिन जेल में ऊम्र कैद की सजा काट रहे रामवीर गुर्जर द्वारा डाकू चन्दन की प्रेमिका और  दस्यु सुंदरी रही रेनू यादव को दुबारा बीहड़ में जागर बचे डाकुओं के गिरोह का लीडर बनने के हुक्म को सुनकर रेनू और  यहाँ की जनता एक बार फिर काँप उठी है / शांत हो चुके बीहड़ में यदि एक बार फिर से असलहे की गर्जना सुनाई डे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं / बीहड़ शांत रहे और वहाँ की जनता चैन की जिंदगी जी सके इसके लिए जरूरत है पुलिस के दमदार और प्रभावी पहल की लेकिन फिलहाल तो पुलिस के कदम कस्बों और शहर तक ही सीमित दिखाई डे रहे हैं / रेनू का कहना है की डकैतों का अंत उसी से शुरू हुआ लेकिन कहीं ऐसा ना हो की एक बार फिर डाकुओं की शुरुआत भी उसी से ना हो जाए / 
फिलहाल चंबल में बड़े डाकू तो नहीं हैं मगर जिस तरह से रामचंद्र गैंग की ताकत बढ़ी है, उसे देख कर 
यही कहा जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर डकैतों का फरमान आ सकता है /.
' अपहरण का दंश झेल चुके चंबल निवासी हरिशचंद्र तिवारी का कहना है, 'चंबल में डाकुओं का फरमान
 एक परंपरा है /. 2014 के संसदीय चुनाव मे भी इसी तरह का प्रभाव नजर आने की संभावनाओं से इंकार
 नहीं किया जा सकता/' फिलहाल, एसएसपी राजेश मोदक ने रामचंद्र पर 10 हजार रुपये का इनाम रख 
दिया है. एसओजी को भी सतर्क कर दिया गया है / 
दरअसल, इस इलाके में डाकू बहुत समय से नेताओं के काम आते रहे हैं/ पहले वे फरमान जारी करके 
नेताओं को जिताते हैं और फिर खुद या अपने रिश्तेदारों को सक्रिय राजनीति में ले आते हैं/ यही वजह है 
कि 2014 लोकसभा चुनाव में बलखंडिया और रामचंद्र यादव जैसे 'उभरते हुए' डकैतों की भूमिका न 
केवल चर्चा का विषय बनी हुई है बल्कि काफी हद असरदार भी साबित हो सकती है/ साफ संकेत मिल 
रहे हैं कि आने वाले लोकसभा चुनाव में डकैतों के फरमान का प्रभाव फिर से नजर आएगा/

फूलन की तरह संसद चाहती है दस्यु सुंदरी रेनू यादव

शिवपाल यादव से मिलने सैफई पहुंची रेनू यादव
एक समय चंबल घाटी की कुख्यात दस्यु सुंदरी रही फूलन देवी की तरह दूसरी दस्यु संुदरिया भी राजनीति मे आने के लिये इस समय लालयित नजर आ रही है। इसी कडी ताजा नाम जुडने जा रहा है रेनू यादव का । रेनू यादव चंबल घाटी मे एक समय मे अपने आतंक और खूबसूरती के कारण खासी चर्चा मे रही है। रेनू यादव समाजवादी पार्टी के जरिये राजनीति मे आने का सपना देख रही है। 
चंबल घाटी के डाकू रहे हो या फिर किसी दूसरे इलाके के डाकू सब पर राजनेताओ की मेहरबानी रही है और इसी मेहरबानी के नतीजे मे डाकुओ को खासी ताकत भी मिली रही है। कभी चंबल मे अपने आतंक और खूबसूरती का जलवा बिखेर चुकी दस्यु संदुरी रेनू यादव समाजवादी पार्टी के जरिये अब राजनीति उतरने का सपना देख रही है। 
उत्तर प्रदेश के कैबनिट मंत्री शिवपाल सिंह यादव से मिलने के लिये सैफई मे पहुॅची पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव को देखने के लिये सैफई मे लोगो का तॉता लग गया हर कोई उसकी एक झलक पाने को बेताव रहा। जींस पेन्ट ओर शर्ट पहने सैफई पहॅुची पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव ने सैफई मे  बातचीत मे कहा कि उसको दस्यु सुन्दरी वनाने वाली पुलिस है पुलिस मुझे बदमाशो के चंगुल से आजाद तो करा नही सकी उल्टा उसे दस्यु सुन्दरी बना दिया जब कि न्याय पालिका ने मुझे पूरी राहत दी और मेरे साथ न्याय किया। 
रेनू यादव का मानना है कि आज समाजवादी पार्टी की सरकार आने के बाद हर किसी को न्याय की आस बंधी है ऐसे मे उसे भी उम्मीद है कि उसके साथ जो अन्याय पुलिस की ओर से किया गया जरूर ही उसको भी न्याय मिलेगा। रेनू अपने साथ हुये अन्याय को लेकर उस समय के पुलिस अफसरो के खिलाफ कार्यवाही चाह रही है क्यो कि रेनू का मानना है कि उसके साथ पुलिस ने ना केवल अन्याय किया बल्कि उसको जान बूझ करके डाकू बनाने मे बडी भूमिका अदा की है। 
रेनू को आज भी वह घटना याद है जब 29 नबम्बर 2003 को स्कूल जाते समय दस्यु चन्दन यादव ने उसका अपहरण कर लिया गया था। जिसमे पुलिस की चौखट पर रेनू यादव के पिता विद्याराम यादव निवासी जमालीपुर थाना कोतवाली औरैया को न्याय नही मिला उनकी थाने मे कोई बात नहीं सुनी गयी। अपहरण के वाद फिरौती के लिये गैंग में रेनू प्रताडना व उत्पीड़न की शिकार होती रही। और गैंग द्वारा जो भी बारदात की जाती उसमें बतौर मुलजिम मेरा नाम भी शामिल कर दिया जाता था। पुलिस ने भी अपनी नाकामी छिपाने के लिए मुझे भी गैंग का सदस्य मानकर मुझे दस्यु सुन्दरी का खिताब दे डाला। 
रेनू यादव बताती है कि दस्यु गैंग में चार जून 2005 को दस्यु चन्दन यादव व दस्यु रामवीर गुर्जर की मुठभेड़ में चन्दन यादव के मारे जाने के बाद दस्यु रामवीर गुर्जर ने मुझे व गैंग को बन्धक बनाकर मुझे अपनी बदनियती का शिकार बनाने की कोशिश की तो मैने दस्यु रामवीर गुर्जर की ही बन्दूक से अपनी इज्जत आवरू की रक्षा हेतु गोली मार दी और मौका पाकर मै वहॉ से भाग निकली। तो इस पर बौखलाहट में रामवीर गुर्जर ने हमारी गैंग के तीन सदस्यों को लाइन में खड़ा कर हत्या कर दी थी। सात दिन तक मैं बीहड़ में भटकने के बाद अपने गांव जमालीपुर आ गयी। और गांव में रहने लगी तो तत्कालीन एस0 एस0 पी0 दलजीत सिंह चौधरी इटावा ने कोतवाली प्रभारी व एस0 ओ0 जी0 प्रभारी ने रेनू के गांव जाकर रेनू को थाना सिविल लाइन लाकर 14 फरवरी को मुझे फर्जी तरीके से जेल भेज दिया। तब से मैं जेल में रहकर अपनी बेगुनाही सावित करने के लिए विभिन्न जनपद न्यायालयों के चक्कर लगाती रही तथा कही जेलों में रही। रेनू यादव ने माना कि हर इन्सान को भगवान व न्याय पालिका पर पूरा भरोसा करना चाहिए कही न्यायलयों ने तो पुलिस को कड़ी फटकार लगाकर मेरे अपहरण व वरामदगी पर फटकार लगायी और ससम्मान दोषमुक्त किया। 29 मई 2012 को सात वर्ष तीन माह 15 दिन की अदालती कार्यवाही झेलने के बाद मै नारी बन्दी निकेतन लखनऊ से रिहा की गयी। पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव ने कहा कि मै अपनी वाकी बची जिन्दगी को गरीबों पीड़ितों की सेवा में लगाना चाहती हूॅ। 
इटावा और औरैया पुलिस के रिकार्ड के अनुसार रेनू यादव का नाम डाकू सूची मे दर्ज है। रेनू यादव के खिलाफ दोनो जिलो मे करीब 15 अपराधिक मामले दर्ज है। जिनमे पुलिस मुठभेड के साथ आगजनी,हत्या के प्रयास के अलावा लूट जैसे वारदातो को अंजाम देने जैसे मामले है। रेनू यादव वैसे तो अपनी अपराधिक वारदातो से बीहडो मे भले ही चर्चा मे बनी रही हो लेकिन उसे देखा गया था पहली बार जब इटावा की सिविल लाइन पुलिस ने इटावा रेलवे स्टेशन के पास से एसएलआर के साथ गिरफतारी की गई। 
चंबल घाटी के इतिहास मे फूलन देवी की तर्ज पर कई महिला डकैत राजनीति मे आ चुकी है इससे पहले सीमा परिहार भी शिवसेना,इंडियन जस्टिस पार्टी मे होते हुये समाजवादी पार्टी मे आ चुकी है लेकिन इस समय सीमा परिहार ने खुद को राजनीति से खुद को दूर कर रहा है क्यो कि वुंडेड फिल्म के जरिये सीमा की जो कहानी आम लोगो की बीच आई उससे वो खुद काफी लोकप्रिय हो गई है। बिगबॉस मे तो पिछले दिनो दर्शक सीमा परिहार को देख ही चुकी बिगबॉस से सीमा परिहार को खास आर्थिक लाभ तो हुआ ही है साथ ही सीमा परिहार को कई हिंदी और भोजपुरी फिल्मो मे भी काम मिल चुका है अब ऐसे ही जाहिर है चंबल मे कभी आंतक मचा चुकी दूसरी दस्युसुंदरिया भी अपने आप को स्थापित करने के लिये राजनीति का सहारा लेने मे जुट गई। सीमा परिहार की चंबल घाटी की पहली ऐसी दस्यु सुंदरी रही है जो डाकू रहने के दौरान 
ही मां बन गई हो इससे पहले ऐसा कोई दूसरा उदाहरण चंबल ना तो देखने को मिला था ही सुनने को मिला था इसके बाद आया नंबर सलीम गैंग की सुरेखा नाम की महिला डाकू का जिसने बेटे को जन्म दिया सुरेखा को उम्रकैद की सजा हो चुकी है। मूल रूप से मध्यप्रदेश भिंड की रहने वाली सुरेखा इस समय भिंड जेल मे उम्रकैद की सजा काट रही है। रेनू यादव चंबल घाटी की तीसरी ऐसी महिला मानी जा रही है जिसने मां बनने का सौभाग्य हासिल किया है। 
समाजवादी पार्टी के जरिये राजनीति मे उतरने का सपना देख रही रेनू यादव एक बेटी की मां है रेनू यादव जिस समय चंदन यादव गैंग मे हुआ करती थी उसी समय उसने एक बेटी को जन्म दिया था जो आज रेनू की मां के पास जमालीपुर गांव मे रह रही है करीब आठ साल की हो चुकी रेनू की बेटी अब स्कूल मे पढने के लिये जाने लगी है।