मंगलवार, 19 मार्च 2013

पान सिंह के हिस्से सिर्फ पदक ही आए

बागी होने से दो साल पहले पान सिंह द्वारा गांव में बनवाया गया मंदिर।

आज भी ऐसी हैं भिडौसा गांव की गलियां

भिडौसा स्थित पान सिंह तोमर का घर

पान सिंह तोमर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की घर सुन गांव में इकट्ठे हुए लोग।

पान सिंह के बहाने बीहड़ एक बार फिर चर्चा में है। बाधा दौड़ के सात बार राष्ट्रीय चैंपियन रहे पान सिंह के जीवन पर बनी तिग्मांशू धूलिया की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’को इस बार सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फिल्म का पुरस्कार मिला है और इस फिल्म में पान सिंह की •ाूमिका नि•ााने वाले इरफान खान को सर्वश्रेष्ठ अ•िानेता चुना गया है। फौजी से डकैत बने इस शख्स की कहानी है ही इतनी स्तब्ध कर देने वाली। बीहड़ को न समझने वालों के लिए यह विस्मय से •ारा जीवन है तो बीहड़ वालों के लिए ‘बागी’ होने की सच्चाई। चंबल के बीहड़ जिन डकैतों के लिए मशहूर हैं उसी चंबल का इलाका अपने जाबाज फौजियों के लिए •ाी जाना जाता है। मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के क्वारी नदी के बीहड़ में बसे अति पिछड़े गांव •िाड़ौसा में जन्में पान सिंह का जीवन मनुष्य के आत्मसम्मान और उसके गौरव से जीने की कहानी है। फौज में •ार्ती होने से पहले पान सिंह की काबिलियत को न तो गांव वाले जानते थे और न स्वयं पानसिंह। 1950 और 1960 में बाधा दौड़ के चैंपियन बनने और 1958 में एशियन खेलों में हिस्से लेने तक •ाी उनकी ख्याति और कहानी ऐसी नहीं थी कि उस पर फिल्म बन सके। बीहड़ को •ाुनाने और उसे पर्दे पर उतारने वालों के लिए बीहड़ सदा से ही दिलचस्प विषय रहा है। मगर अगर पान सिंह डकैत न होते तो शायद ही राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सफलता या काबिलियत के कोई मायने होते।
हालांकि, पानसिंह जिन परिस्थितियों में डकैत बने वह बीहड़ के लिए कोई अनोखी बात नहीं थी। 70 के दशक तक इस इलाके में डकैत को ‘बागी’ कहने का ही चलन था। यानी वह शख्स जो व्यवस्था से परेशान होकर उसका विरोध करता है। इस दशक में बीहड़ में कई और नामी डकैत मलखान सिंह, मोहर सिंह, माखन सिंह, माधो सिंह •ाी थे और इनके डकैत बनने के पीछे •ाी कमोबेश वही कारण थे जिन्होंने पान सिंह को डकैत बनने के लिए मजबूर किया। पान सिंह को बागी कहें या डकैत इस परंपरा से अगर कोई चीज उन्हें अलग करती है तो वह है मनुष्यता के लिए उनका लगातार संघर्ष। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर उनकी वह उपलब्धियां जो शायद किसी अन्य डकैत में नहीं थी। हालांकि घनश्याम बाबा पान सिंह से कहीं अधिक पढ़े लिखे थे तो मान सिंह ने अधिक कष्ट उठाए थे। माखन और मलखान सिंह को पान सिंह से अधिक अपमानित होना पड़ा था और मुरैना इलाके में मशहूर डकैत घनश्याम अधिक चमत्कारिक। घनश्याम डकैत खड़े ऊंट पर बिना किसी के सहारे चढ़ जाते थे और उस समय जिन इलाकों में उन्होंने डकैती डाली वह जानते हैं कि वह क•ाी जमीन न पर चलकर मकान से मकान ही चलते थे। फुर्तीले इतने गजब के कि अगर उन्हें मौका मिला होता तो वह बांसकूद या ऊंची कूद के राष्ट्रीय चैंपियन तो अवश्य ही होते। पानसिंह ने डकैत बनने के बाद •ाी क•ाी कोई जघन्य कांड नहीं किया। यहां तक कि अपने •ातीजे बलवंत को •ाी उसने आठ गुर्जरों को मारने से रोका था।
डकैतों के जीवन पर पहली बार कोई फिल्म नहीं बनी है। इससे पहले पुतली बाई और मोहर सिंह-माधो सिंह के जीवन को लेकर •ाी फिल्म बनाई जा चुकी हैं, लेकिन जो शोहरत और सफलता पान सिंह तोमर की फिल्म को मिली वह दरअसल पानसिंह के जीवन और उनके संघर्ष की सफलता है। हां, बीहड़ पर फिल्म बनाकर •ाले ही तिग्मांशू धूलिया ने पानसिंह के जीवन को चर्चा में ला दिया हो लेकिन न तो इससे बीहड़ का कुछ •ाला होने वाला है और न ही पान सिंह के उस परिवार का जो आज •ाी बेहतर स्थिति में नहीं है। पान सिंह के पुत्र ने तो तिग्मांशू पर कुछ आरोप •ाी लगाए थे और उनकी विधवा पत्नी झांसी में सामान्य सा जीवन गुजारती है। पान सिंह का गांव •िाडौसा आज •ाी उतना ही उजड्ड और पिछड़ा हुआ है। आखिर पान सिंह और उसके गांव को ‘पदक’के सिवा मिला ही क्या है। हालांकि तिग्मांशू की यह फिल्म इस क्षेत्र के जीवन और उसकी कठिनाई को अधिक वास्तवित तौर पर पर्दे पर उतारने में सफल रही है। जैसा कि पत्रकारिता में शोध कार्य कर रहे और ग्वालियर के पत्रकार •ाुवनेश तोमर कहते हैं कि इस फिल्म ने पान सिंह के संघर्ष और इस इलाके की कठिनाई को नए तरीके से सबसे सामने रखा है। यह फिल्म इस इलाके की बदनामी करती हुई नहीं लगती बल्कि एक बार फिर सोचने को मजबूर कतकी है कि यहां हालात ऐसे क्यों हैं।

1 टिप्पणी:

praveen singh rao ने कहा…

sarkar ko paan singh ji tomar ko sahid ghosit karna chahiye or inke parivar arthik sahayata deni chahiye