बुधवार, 26 सितंबर 2012

कृष्णा मिश्रा की नई फिल्म का टाइटल मेरे ब्लॉग से

' वुंडेड' फेम फिल्म निर्देशक कृष्णा मिश्रा अब नई फिल्म लेकर आ रहे हैं। निर्भय गुर्जर के जीवन पर बनी इस फिल्म का ' बीहड़ ' रखा गया है। यह तो मेरे ब्लॉग का नाम है। कृष्णा ने ऐसा क्यों किया है और क्या यह चोरी नहीं है। इस पर कानूनी सलाहकारों से मशविरा कर में अगला कदम उठाउंगा। यह फिल्म निर्भय सिंह गुज्जर की सच्ची कहानी पर  आधारित है और इस फिल्म में डाकू मान सिंह खुद अपनी भूमिका निभा रहे हैं. हाल ही में फिल्म के सिलसिले में  डाकू मान  सिंह दिल्ली आए और मीडिया से रुबरु हुऐ. फिल्म में फूलन देवी का किरदार निभा रही दीपिका शर्मा भी उनके साथ मौजूद  थीं.  इस फिल्म में कृष्णा ने बीहड़ के रियल मुद्दों को उठाया है, उम्मीद है कि दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ पाएगी।

फिल्म की कहानी डाकू मान सिंह के डाकू बनने पर आधारित है. कृष्णा मिश्रा से पूछने पर कि डाकू मान सिंह के लिए उन्होंने  मान सिंह से ही क्यों संपर्क किया, इस पर उनका जवाब था, मैं चाहता था कि कोई रियल किरदार ही डाकू मान सिंह की  भूमिका में दिखे. इसलिए मैंने सोचा कि डाकू मान सिंह से बेहतर विकल्प दूसरा कोई हो नहीं सकता. इसी विश्वास से साथ  जब मैंने उनसे संपर्क किया और फिल्म के बारे में बताया और साथ ही इच्छा जाहिर की कि वही इस फिल्म में काम करें तो  वह तुरंत तैयार हो गए. इससे अच्छी बात मेरे लिए और क्या हो सकती थी कि खुद डाकू मान सिंह अपना किरदार निभाएं.

शनिवार, 22 सितंबर 2012

बीहड़ में फिर से फरमान सुनाने की तैयारी ?

बीहड़ में डकैत रामवीर गुर्जर (फाइल फोटो)।
रेनू यादव


 





चम्बल के कटीले जंगलों से डर रही है रेनू यादव , मगर पूर्व डाकू रामवीर चाहता है की रेनू फिर से उठाये असलहा और कूदे बीहड़ में / 
डाकुओं को "इष्टदेव" के रूप में पूजने वाले नेताओं की इसमें कोई चाल तो नहीं ?

देश की दिशा और दशा तय करने वाले  "राजनेता " दिल्ली में बैठकर सरकार की उम्र के आकलन के 
साथ  लोक सभा चुनाव की तैयारी में लग गए हैं तो दिल्ली से सैकड़ों मील दूर चम्बल और पाठा के डाकू 
भी आगामी लोक सभा चुनाव में अपनी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उपस्थिति की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं 
/ उनको पता है की इस इलाके  में होने वाले चुनाव में उनकी थोड़ी सी भागीदारी उन्हें बड़ा इनाम दिला 
सकती है लिहाजा इस मौके को वह भुनाने की पूरी कोशिस में जुट गये हैं / चुनाव के दरम्यान कई बार 
इस इलाके के नेताओं के बीच "इष्टदेव" के रूप में पूजे जा चुके चम्बल और पाठा के डकैत अपनी नयी 
योजना की सफलता की तैयारी में उतनी ही सिद्दत के साथ लगे हैं जितना चुनाव लड़ने के लिए नेता / 
  चंबल के कुख्यात डकैत निर्भय गुर्जर , रज्जन गुर्जर , सलीम , और  और पाठा के   ददुआ, ठोकिया और 
रागिया की मौत के बाद कुछ समय के लिए चंबल और पाठा की  घाटी शांत हो गई थी, २०१२ में हुए 
यू.पी. अस्सेम्बली के चुनाव में डाकुओं के फरमान के बगैर जब चुनाव हुआ तो बीहड़ी इलाके की जनता 
ने भी बिना  किसी डर के दिल खोल कर मतदान क्या / लेकिन लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही डकैतों 
के कदमों की आहट फिर से सुनाई देने लगी है /.बीहड़ी सूत्रों के मुताबिक़  राजनीतिक आकाओं ने उन्हें 
फिर से बढ़ावा देना शुरू कर दिया है / .पाठा में  रागिया गिरोह की कमान संभालकर बलखंडिया पटेल ने
 आतंक का नया अध्याय शुरू कर दिया है / . डकैतों के रहमो-करम पर सांसद-विधायक बनने वाले 
सफेदपोशों ने भी बलखंडिया को ददुआ और ठोकिया की तरह 'ईष्ट' मान लिया है / जो जानकारी मिली है 
उसके मुताबिक़  पिछले माह चित्रकूट की अदालत में  पेशी के बाद   बांदा जाते समय पुलिस हिरासत से 
भागे 13 डकैत भी उसके गिरोह में शामिल हो गए हैं./  दूसरी तरफ, देश की आतंरिक और वाह्य सुरक्षा के
 लिए  कभी पंजाब में तैनात रहा सीआरपीएफ का सिपाही राम चन्द्र अब स्वयं अमन पसंद जनता के 
लिए ख़तरा बन गया है /  फौजी  रामचंद्र यादव भी चंबल में आ धमका है./  उसका गिरोह भी तेजी से 
अपना प्रभाव बढ़ाता जा रहा है./ सैकड़ों किलोमीटर की परिधि में फैले चम्बल के बीहड़ में रामचंद्र की 
चहल कदमी निर्द्वंद जारी है /  रामचंद्र ने बीहड़ में मारे जा चुके डाकुओं के गिरोह के बचे हुए डकैतों से 
संपर्क साधा और धीरे-धीरे उन्हें अपने साथ मिला लिया. आज उसके गैंग में 10-12 डकैत  हैं, जिनके 
पास अत्याधुनिक हथियार भी है./ इसके अलावा जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे अरविन्द 
गुर्जर के गिरोह ने बाहर खुली हवा में सांस ले रही पूर्व दस्यु सुंदरी रेनू यादव को एक बार फिर से चम्बल 
के बीहड़ों में भेजने और उसके गैंग के बचे डाकुओं की कमान सम्हालने की धमकी दे रहा है / रेनू यादव अपनी सुरक्षा की गुहार प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर कर चुकी है / रेनू का कहना है की चम्बल में डाकुओं के अंत की कहानी उसी के गिरोह से शुरू हुयी / ४ दिसंबर २००५ की रात उसे अच्छी तरह से याद है / औरैया जिले के मई गाँव के जंगलों में डाकू चन्दन यादव अपनी दस्यु सुंदरी रेनू यादव और गिरोह के अन्य सदस्यों के साथ आराम कर रहा था / तभी उस वक्त का सबसे खूंखार डाकू रामवीर गुर्जर अपने साथी डकैतों के साथ वहाँ आ धमका / दरअसल वह चाहता   था की  रेनू यादव चन्दन यादव  का साथ छोड़  कर उसकी  हमराह  बने  मगर  यह  ना  तो  चन्दन को पसंद  था और ना  ही  रेनू इससे सहमत  हुयी / रामवीर जानता  था की चन्दन के जीते  जी  वह  रेनू को नहीं  पा  सकता  / राम  वीर  ने  ६  घंटे  से अधिक  समय  तक  फायरिंग  कर चन्दन को मई के जंगलों में मार  गिराया  लेकिन  रेनू फिर भी  रामवीर  के गिरोह में शामिल नहीं हुयी / रेनू ने रामवीर की बन्दूक छीनकर उसको गोली मारकर लहूलुहान कर दिया और जंगल से भाग आई / रेनू के इस कदम से रामवीर गुर्जर बौखला गया और उसने अगले ही दिन चन्दन गिरोह के तीन अन्य सदस्यों को कैथौली के जंगलों में मारकर फेंक दिया / डाकुओं के बीच लगातार शुरू हुए गैंगवार का फायदा पुलिस ने उठाना शुरू किया / आखिर कार डाकुओं की दरिंदगी से परेशान बीहड़ की जनता पुलिस की सहायता के लिए आगे आई और चम्बल के ज्यादातर डाकू या तो पुलिस की गोलियों के शिकार हुए या फिर जान बचाने के लिए सरेंडर कर दिए / २०१२ में हुआ असेम्बली का चुनाव डाकुओं बगैर किसी फरमान के संपन्न हो गया / राज्य के अन्य हिस्सों की तरह यहाँ की जनता ने भी जागरूकता दिखाई और जमकर मतदान किया वह भी बिना किसी डर और भय के / यहाँ की जनता को लगा की डाकुओं का फरमान अब इतिहास बन चुका है और भविष्य उनका है जिसमे वह अपने पसंद का प्रतिनिधि चुनकर अपने इलाके के विकास की नयी इबारत लिखेंगे / लेकिन जेल में ऊम्र कैद की सजा काट रहे रामवीर गुर्जर द्वारा डाकू चन्दन की प्रेमिका और  दस्यु सुंदरी रही रेनू यादव को दुबारा बीहड़ में जागर बचे डाकुओं के गिरोह का लीडर बनने के हुक्म को सुनकर रेनू और  यहाँ की जनता एक बार फिर काँप उठी है / शांत हो चुके बीहड़ में यदि एक बार फिर से असलहे की गर्जना सुनाई डे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं / बीहड़ शांत रहे और वहाँ की जनता चैन की जिंदगी जी सके इसके लिए जरूरत है पुलिस के दमदार और प्रभावी पहल की लेकिन फिलहाल तो पुलिस के कदम कस्बों और शहर तक ही सीमित दिखाई डे रहे हैं / रेनू का कहना है की डकैतों का अंत उसी से शुरू हुआ लेकिन कहीं ऐसा ना हो की एक बार फिर डाकुओं की शुरुआत भी उसी से ना हो जाए / 
फिलहाल चंबल में बड़े डाकू तो नहीं हैं मगर जिस तरह से रामचंद्र गैंग की ताकत बढ़ी है, उसे देख कर 
यही कहा जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर डकैतों का फरमान आ सकता है /.
' अपहरण का दंश झेल चुके चंबल निवासी हरिशचंद्र तिवारी का कहना है, 'चंबल में डाकुओं का फरमान
 एक परंपरा है /. 2014 के संसदीय चुनाव मे भी इसी तरह का प्रभाव नजर आने की संभावनाओं से इंकार
 नहीं किया जा सकता/' फिलहाल, एसएसपी राजेश मोदक ने रामचंद्र पर 10 हजार रुपये का इनाम रख 
दिया है. एसओजी को भी सतर्क कर दिया गया है / 
दरअसल, इस इलाके में डाकू बहुत समय से नेताओं के काम आते रहे हैं/ पहले वे फरमान जारी करके 
नेताओं को जिताते हैं और फिर खुद या अपने रिश्तेदारों को सक्रिय राजनीति में ले आते हैं/ यही वजह है 
कि 2014 लोकसभा चुनाव में बलखंडिया और रामचंद्र यादव जैसे 'उभरते हुए' डकैतों की भूमिका न 
केवल चर्चा का विषय बनी हुई है बल्कि काफी हद असरदार भी साबित हो सकती है/ साफ संकेत मिल 
रहे हैं कि आने वाले लोकसभा चुनाव में डकैतों के फरमान का प्रभाव फिर से नजर आएगा/

फूलन की तरह संसद चाहती है दस्यु सुंदरी रेनू यादव

शिवपाल यादव से मिलने सैफई पहुंची रेनू यादव
एक समय चंबल घाटी की कुख्यात दस्यु सुंदरी रही फूलन देवी की तरह दूसरी दस्यु संुदरिया भी राजनीति मे आने के लिये इस समय लालयित नजर आ रही है। इसी कडी ताजा नाम जुडने जा रहा है रेनू यादव का । रेनू यादव चंबल घाटी मे एक समय मे अपने आतंक और खूबसूरती के कारण खासी चर्चा मे रही है। रेनू यादव समाजवादी पार्टी के जरिये राजनीति मे आने का सपना देख रही है। 
चंबल घाटी के डाकू रहे हो या फिर किसी दूसरे इलाके के डाकू सब पर राजनेताओ की मेहरबानी रही है और इसी मेहरबानी के नतीजे मे डाकुओ को खासी ताकत भी मिली रही है। कभी चंबल मे अपने आतंक और खूबसूरती का जलवा बिखेर चुकी दस्यु संदुरी रेनू यादव समाजवादी पार्टी के जरिये अब राजनीति उतरने का सपना देख रही है। 
उत्तर प्रदेश के कैबनिट मंत्री शिवपाल सिंह यादव से मिलने के लिये सैफई मे पहुॅची पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव को देखने के लिये सैफई मे लोगो का तॉता लग गया हर कोई उसकी एक झलक पाने को बेताव रहा। जींस पेन्ट ओर शर्ट पहने सैफई पहॅुची पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव ने सैफई मे  बातचीत मे कहा कि उसको दस्यु सुन्दरी वनाने वाली पुलिस है पुलिस मुझे बदमाशो के चंगुल से आजाद तो करा नही सकी उल्टा उसे दस्यु सुन्दरी बना दिया जब कि न्याय पालिका ने मुझे पूरी राहत दी और मेरे साथ न्याय किया। 
रेनू यादव का मानना है कि आज समाजवादी पार्टी की सरकार आने के बाद हर किसी को न्याय की आस बंधी है ऐसे मे उसे भी उम्मीद है कि उसके साथ जो अन्याय पुलिस की ओर से किया गया जरूर ही उसको भी न्याय मिलेगा। रेनू अपने साथ हुये अन्याय को लेकर उस समय के पुलिस अफसरो के खिलाफ कार्यवाही चाह रही है क्यो कि रेनू का मानना है कि उसके साथ पुलिस ने ना केवल अन्याय किया बल्कि उसको जान बूझ करके डाकू बनाने मे बडी भूमिका अदा की है। 
रेनू को आज भी वह घटना याद है जब 29 नबम्बर 2003 को स्कूल जाते समय दस्यु चन्दन यादव ने उसका अपहरण कर लिया गया था। जिसमे पुलिस की चौखट पर रेनू यादव के पिता विद्याराम यादव निवासी जमालीपुर थाना कोतवाली औरैया को न्याय नही मिला उनकी थाने मे कोई बात नहीं सुनी गयी। अपहरण के वाद फिरौती के लिये गैंग में रेनू प्रताडना व उत्पीड़न की शिकार होती रही। और गैंग द्वारा जो भी बारदात की जाती उसमें बतौर मुलजिम मेरा नाम भी शामिल कर दिया जाता था। पुलिस ने भी अपनी नाकामी छिपाने के लिए मुझे भी गैंग का सदस्य मानकर मुझे दस्यु सुन्दरी का खिताब दे डाला। 
रेनू यादव बताती है कि दस्यु गैंग में चार जून 2005 को दस्यु चन्दन यादव व दस्यु रामवीर गुर्जर की मुठभेड़ में चन्दन यादव के मारे जाने के बाद दस्यु रामवीर गुर्जर ने मुझे व गैंग को बन्धक बनाकर मुझे अपनी बदनियती का शिकार बनाने की कोशिश की तो मैने दस्यु रामवीर गुर्जर की ही बन्दूक से अपनी इज्जत आवरू की रक्षा हेतु गोली मार दी और मौका पाकर मै वहॉ से भाग निकली। तो इस पर बौखलाहट में रामवीर गुर्जर ने हमारी गैंग के तीन सदस्यों को लाइन में खड़ा कर हत्या कर दी थी। सात दिन तक मैं बीहड़ में भटकने के बाद अपने गांव जमालीपुर आ गयी। और गांव में रहने लगी तो तत्कालीन एस0 एस0 पी0 दलजीत सिंह चौधरी इटावा ने कोतवाली प्रभारी व एस0 ओ0 जी0 प्रभारी ने रेनू के गांव जाकर रेनू को थाना सिविल लाइन लाकर 14 फरवरी को मुझे फर्जी तरीके से जेल भेज दिया। तब से मैं जेल में रहकर अपनी बेगुनाही सावित करने के लिए विभिन्न जनपद न्यायालयों के चक्कर लगाती रही तथा कही जेलों में रही। रेनू यादव ने माना कि हर इन्सान को भगवान व न्याय पालिका पर पूरा भरोसा करना चाहिए कही न्यायलयों ने तो पुलिस को कड़ी फटकार लगाकर मेरे अपहरण व वरामदगी पर फटकार लगायी और ससम्मान दोषमुक्त किया। 29 मई 2012 को सात वर्ष तीन माह 15 दिन की अदालती कार्यवाही झेलने के बाद मै नारी बन्दी निकेतन लखनऊ से रिहा की गयी। पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव ने कहा कि मै अपनी वाकी बची जिन्दगी को गरीबों पीड़ितों की सेवा में लगाना चाहती हूॅ। 
इटावा और औरैया पुलिस के रिकार्ड के अनुसार रेनू यादव का नाम डाकू सूची मे दर्ज है। रेनू यादव के खिलाफ दोनो जिलो मे करीब 15 अपराधिक मामले दर्ज है। जिनमे पुलिस मुठभेड के साथ आगजनी,हत्या के प्रयास के अलावा लूट जैसे वारदातो को अंजाम देने जैसे मामले है। रेनू यादव वैसे तो अपनी अपराधिक वारदातो से बीहडो मे भले ही चर्चा मे बनी रही हो लेकिन उसे देखा गया था पहली बार जब इटावा की सिविल लाइन पुलिस ने इटावा रेलवे स्टेशन के पास से एसएलआर के साथ गिरफतारी की गई। 
चंबल घाटी के इतिहास मे फूलन देवी की तर्ज पर कई महिला डकैत राजनीति मे आ चुकी है इससे पहले सीमा परिहार भी शिवसेना,इंडियन जस्टिस पार्टी मे होते हुये समाजवादी पार्टी मे आ चुकी है लेकिन इस समय सीमा परिहार ने खुद को राजनीति से खुद को दूर कर रहा है क्यो कि वुंडेड फिल्म के जरिये सीमा की जो कहानी आम लोगो की बीच आई उससे वो खुद काफी लोकप्रिय हो गई है। बिगबॉस मे तो पिछले दिनो दर्शक सीमा परिहार को देख ही चुकी बिगबॉस से सीमा परिहार को खास आर्थिक लाभ तो हुआ ही है साथ ही सीमा परिहार को कई हिंदी और भोजपुरी फिल्मो मे भी काम मिल चुका है अब ऐसे ही जाहिर है चंबल मे कभी आंतक मचा चुकी दूसरी दस्युसुंदरिया भी अपने आप को स्थापित करने के लिये राजनीति का सहारा लेने मे जुट गई। सीमा परिहार की चंबल घाटी की पहली ऐसी दस्यु सुंदरी रही है जो डाकू रहने के दौरान 
ही मां बन गई हो इससे पहले ऐसा कोई दूसरा उदाहरण चंबल ना तो देखने को मिला था ही सुनने को मिला था इसके बाद आया नंबर सलीम गैंग की सुरेखा नाम की महिला डाकू का जिसने बेटे को जन्म दिया सुरेखा को उम्रकैद की सजा हो चुकी है। मूल रूप से मध्यप्रदेश भिंड की रहने वाली सुरेखा इस समय भिंड जेल मे उम्रकैद की सजा काट रही है। रेनू यादव चंबल घाटी की तीसरी ऐसी महिला मानी जा रही है जिसने मां बनने का सौभाग्य हासिल किया है। 
समाजवादी पार्टी के जरिये राजनीति मे उतरने का सपना देख रही रेनू यादव एक बेटी की मां है रेनू यादव जिस समय चंदन यादव गैंग मे हुआ करती थी उसी समय उसने एक बेटी को जन्म दिया था जो आज रेनू की मां के पास जमालीपुर गांव मे रह रही है करीब आठ साल की हो चुकी रेनू की बेटी अब स्कूल मे पढने के लिये जाने लगी है।

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

बेहमई कांड: 30 साल में नहीं हो सकी गवाही

12 सितंबर को फिर बेहमई कांड की कानपुर देहात के एडीजे कोर्ट में सुनवाई है। 80 के दशक में देश को हिला देने वाले बेहमई हत्याकांड को 30 साल गुजर जाने के बाद भी इस मामले में आज तक गवाही नहीं हो सकी है। इत दौरान मामले के सभी मुख्य आरोपियों की मौत हो चुकी है। मामले में चार आरोरियों के खिलाफ नामजद और 36 अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। इनमें से अब केवल सात ही जिंदा हैं।
चंबल और यमुना के बीहड़ों में 80 के दशक में डकैत गैंगों की आपसी दुशमनी को यहां के निरीह ग्रामीणों को भोगना पड़ा। फूलन देवी के गैंग ने बेहमई में 14 फरवरी 1981 को शाम ढले हमलाकर ठाकुर जाति के 21 ग्रामीणों को मार दिया था। फूलन की निगाह में बेहमई गांव उसके विरोधी डाकू  लालाराम श्रीराम गिरोह की शरणस्थली था और इसी गांव के एक स्थान पर डाकू  लालाराम ने फूलन देवी की इज्जत लूटी थी। इस घटना की प्रतिक्रिया में गुस्साए श्रीराम-लालाराम के गैंग ने 26 मई 1984 को औरैया जिले के मई-अस्ता गांव में 13 मल्लाह जाति के लोगों को मार दिया था।
बेहमई मामले की रिपोर्ट कानपुर देहात में दर्ज की गई। इस मामले में फूलनदेवी, रामअवतार, मुस्तकीम और लल्लू को नामजद कराते हुए 36 अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया। तब से लेकर अब तक इस मामले में पीड़ित न्याय की बाट देख रहे हैं। जवानी में जो विधवा हुईं वह बुढ़ा गई हैं। जो बच्चे थे वह जवान हो गए हैं लेकिन अभी तक इस मामले में गवाही तक नहीं की जा सकी है। इस मामले की सुनवाई कानपुर देहात के एडीजे कोर्ट सात में चल रही है। आरोपी पक्ष के वकील गिरीश नारायण द्विवेदी बताते हैं कि इन 30 सालों में इस मामले में 460 से अधिक तारीखें लग चुकी हैं। बीते दो-ढाई साल से तो हर तारीख में आरोपियों को हाजिर करने के लिए पुलिस को नोटिस जारी किए जा रहे हैं लेकिन आरोपियों को उपस्थित नहीं किया जा सका है। उन्होंने बताया कि इस मामले में सभी चारों मुख्य आरोपियों की मौत हो चुकी है। कुल 40 लोगों में अभी सात लोग ही जिंदा बचे हैं। इनमें एक आरोपी रामसिंह जेल में है। तीन आरोपी भीखा, विश्वनाथ उर्फ पुतानी उर्फ कृष्णस्वरूप और फोसे उर्फ फोसा जमानत पर हैं। तीन आरोपी श्यामू और दो अन्य ऐसे हैं जिन्हें अदालत में हाजिर करने के लिए न्यायालय से बार-बार नोटिस दिए जा रहे हैं लेकिन पुलिस उन्हें हाजिर नहीं कर सकी है।
इस मामले में पीड़ितों के पैरोकार राजाराम का कहना है कि वह वर्षों से मामले में न्याय की उम्मीद लगाए हुए कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। इसके लिए वह सब कुछ भूलकर केस लड़ रहे हैं। मगर पिछले महीने तक तो इस मामले में आरोप तक तय नहीं किए जा सके। अदालत ने 24 अगस्त 2012 को मामले में आरोप तय किया। अब आज बुधवार 12 सितंबर को मामले में गवाही होनी है लेकिन नहीं लगता कि इस दिन गवाही हो पाएगी। वकील गिरीश नारायण का कहना है कि कानपुर कोर्ट में स्ट्राइक हो सकती है।

‘‘इस मामले में देरी का कारण यह रहा कि कभी भी आरोपियों को एक साथ न्यायालय में हाजिर नहीं किया जा सका।’’
गिरीश नारायण द्विवेदी, मामले में वकील

सोमवार, 10 सितंबर 2012

बेहमई का अर्जुन

रामकरन का बेहमई गांव स्थित घर।
rastrapati se arjun award leta ramkaran

















यूपी का बीहड़ी गांव बेहमई 31 साल बाद फिर सुर्खियों में है। डकैत फूलनदेवी की करतूत से विश्वपटल पर पहली बार आए इस गांव की कालिमा को गांव के सपूत के कारनामे ने धो डाला है। यहां के रामकरन सिंह को एथलीट के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अजुर्न अवार्ड से पुरस्कृत किया गया है। रामकरन की उपलब्धि इस मायने में बेमिसाल है कि भूख और गरीबी के साथ वह जिंदगी भर एक कालिमा से भी लड़ा है। रामकरन आंखों की रोशनी गवां चुका है।
कानपुर देहात जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम दिशा में राजपुर थाना क्षेत्र का ठेठ बीहड़ी गांव है बेहमई। घनघोर गरीबी, अशिक्षा और दहशत यहां की नीयत है। 14 फरवरी 1981 को इसी गांव में फूलनदेवी ने 22 ठाकुरों को गोलियों से भून दिया था। 1990 में इस गांव के वीरेंद्र सिंह और कृष्णा सिंह के यहां रामकरन ने जन्म लिया तब बेहमई कांड को नौ साल हो गए थे। डकैतों की क्रूरता में जीते इस गांव का भविष्य अंधेरे में था। मगर एक अंधेरा और था जो रामकरन की राह में उसका इंतजार कर रहा था। मात्र चार साल की उम्र में एक हादसे ने रामकरन के जीवन में अंधेरा फैला दिया। 1994 की एक सुबह दीपावली के आसपास एक पटाखा चलाते समय रामकरन की आंखों की रोशनी सदा के लिए चली गई। अब इस कालिमा से ही उसे जिंदगी भर जूझना था। इस हादसे में रामकरन का भाई रामनरेश भी घायल हो गया। रामकरन रोजमर्रा के साधारण काम के लिए भी दूसरों पर निर्भर था, मगर अंदर वह इस साधारणता को असाधारण में बदलने को जूझ रहा था। इस हालत में भी वह भाई के साथ गांव के स्कूल जाता रहा। दो साल बाद उसने दिल्ली के अंध विद्यालय में जाने की जिद पकड़ ली। किसी तरह दो जून रोटी खाने वाले परिवार के लिए यह पहाड़ खोदना था, मगर रामकरन के परिवार ने हार नहीं मानी। महज आठ वर्ष की उम्र में वह दिल्ली के किंगसेव कैंप अंधविद्यालय में प्रवेश को जूझ रहा था। इस विद्यालय में प्रवेश पाने में ही उसे दो साल लग गए। मगर उसने दिल्ली का दामन नहीं छोड़ा। 2006 का साल रामकरन के जीवन में सबेरा लेकर आया। उसने द्लिी की क्रॉस कंट्री साल्वन मैराथन में भाग लेने का फैसला किया। इस मैराथन में वह प्रथम आया। यहीं से उसने एथलीट बनने की ठानी। वह भी अकेले अपने दम पर। 2006 से 2009 तक वह तीन बार पैराएथलीट आयोजन में नेशनल चैंपियन चुना गया। इसके बाद यूएसए  में 2009 में हुए यूथ चैंपियनशिप के लिए वह चयनित हुए लेकिन उसमें खेल नहीं सके। 2010 में चीन में होने वाले एशियन गेम्स में सिल्वर मैडल हासिल किया और 2011में तुर्की में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में 10 और 5 किलोमीटर दौड़ में दो कांस्य हासिल किए। 2012 में पैराओलंपिक क्वालीफाईंग के लिए मलेशिया में हुई चैंपियनशिप में उनके हिस्से में दो गोल्ड आए। उन्हें यहां नया एशियन रिकार्ड भी बनाया। 800 मीटर की दूरी उन्होंने रिकार्ड 2.3 मिनट में पूरी की। मगर इस बार भी वह आईसीसी लाइसेंस न मिल पाने के कारण पैराओलंपिक में भाग नहीं ले सके। मगर उनके प्रदर्शन को देखते हुए रामकरन को अर्जुन अवार्ड से पुरस्कृत किया गया है।
रामकरन सिंह ने कल्पतरु को बताया कि वह रोज सुबह-शाम दो-दो घंटे अभ्यास करते हैं। वह सामान्य लोगों के साथ अभ्यास में भाग लेते हैं। वह अफसोस के साथ कहते हैं कि सरकार से उन्हें कोई सुविधा कभी नहीं मिली। वह आज भी अभ्यास के लिए 18 किलोमीटर दूर नेहरु स्टेडियम दिल्ली परिवहन की बसों से जाना पड़ता है। अपनी उपलब्धि से खुश रामकरन कहते हैं कि उनके माता-पिता इससे खुश हैं लेकिन अशिक्षा के कारण वह समझ ही नहीं पा रहे कि उनके बेटे ने क्या हासिल किया है। रामकरन का गांव आज उनकी इस उपलब्धि से फूला नहीं समाता। उनके पिता कहते हैं कि रामकरन की उपलब्धि इसलिए और बड़ी है कि वह जिंदगी भर मुसीबत और गरीबी से जूझा है। रामकरन की छोटी बहन आसमा इस उपलब्धि से बेहद खुश है। रामकरन पैराओलंपिक में पदक पाने के साथ एक अच्छी नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे हैं ताकि गरीबी और अशिक्षा में जी रहे उनके घर की दशा और दिशा दोनों बदल सकें।

सफलता का सफर
2006- दिल्ली की साल्वन मैराथन का विजेता
2006-09- तीन बार पैरानेशनल चैंपियनशिप जीती
2009- यूएसए में होने वाली यूथ चैंपियनशिप के लिए चयनित
2010 चीन में एशियन गेम्स में सिल्वर मैडल
2011में तुर्की में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में 10 और 5 किलोमीटर दौड़ में दो कांस्य।
 2012 पैराओलंपिक क्वालीफाईंग के लिए मलेशिया में हुई चैंपियनशिप में दो गोल्ड।
800 मीटर दौड़ में 2.3 मिनट लेकर एशियन रिकार्ड अपने नाम किया।

रामकरन से दो टूक बात

अफसोस की राज्य सरकार ने कुछ नहीं किया
आगरा। अपने दम पर उपलब्धि की इबारत लिखने वाले रामकरन सिंह को अफसोस है कि जिस राज्य के लिए उसने यह सब किया उसने उसकी उपलब्धि पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है। वह प्रदेश के मुखिया अखिलेश यादव को तेजतर्रार तो मानता है लेकिन उसे पता नहीं कि उनसे मुलाकात कैसे की जा सके। इसके साथ ही वह अपने बीहड़ी गांव की हालात और 31 साल पहले हुए अन्याय को लेकर भी व्यथित है लेकिन उसका लक्ष्य साफ है। पैराओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना। उनसे हुई बातचीत।
- अपनी उपलब्धि के लिए किसे धन्यवाद देते हैं।
- अपने माता-पिता और बड़े भाई को, जिन्होंने कभी भी उसका साथ नहीं छोड़ा। खुद आधी रोटी खाकर मुझे दिल्ली में रहने की व्यवस्था की। साथ ही कोच सतपाल सिंह और हॉस्टल फॉर कॉलेज गोइंग ब्लाइंड स्कूल किंगसेव कैंप, तिलक नगर दिल्ली के उन साथियों को जिन्होंने हमेशा हौंसला बढ़ाया।
- और सरकार के बारे में।
- केंद्र और राज्य सरकार से उन्हें कभी कोई सहायता नहीं मिली। यहां तक कि पहली मैराथन और तीन बार नेशनल चैंपियनशिप जीतने के बाद भी किसी ने नहीं पूछा। बस यह अर्जुन अवार्ड मिला है।
- कभी किसी से सहायता मांगी।
- हमारा परिवार गरीबी रेखा में आता है। शुरू में खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने तक के पैसे नहीं होते थे। ऐसे में हमने अपने क्षेत्र के विधायक (शायद उनका नाम मिथलेश था) से संपर्क किया अपनी समस्या रखी, मगर कोई मदद नहीं मिल सकी। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के पीए से फोन पर बात की, मेल भी भेजी मगर किसी ने मिलने तक का समय नहीं दिया। ऐसे में भला हम कर भी क्या सकते थे।
- अपने गांव बेहमई के लोगों के लिए कोई संदेश।
अपने दुर्भाग्य को मेहनत से ही बदला जा सकता है, मैं गांव वालों से बस यही कह सकता हूं। मेरे गांव में आज तक बिजली नहीं पहुंची, संपर्क मार्ग ठीक नहीं है। स्कूल भी ठीक नहीं बना। अगर में कुछ कर सका तो गांव में स्कूल और बिजली के लिए सरकार से पैरवी करूंगा। साथ ही चाहूंगा कि हमारे गांव की लड़कियां खूब पढ़ें।

आगे क्या करने का विचार है।
- मेरा सपना देश के लिए पैराओलंपिक में स्वर्ण लाने का है। इसके लिए मैं जमकर मेहनत कर रहा हूं। रोज सुबह चार बजे जागता हूं और हॉस्टल से 18 किलोमीटर दूर नेहरू स्टेडियम जाता हूं। यहां सामान्य लोगों के साथ दो घंटे तक नियमित अभ्यास करता हूं। शाम को भी दो घंटे मेहनत करता हूं। अफसोस यह है कि आज भी मुझे इसके लिए कोई सहायता नहीं मिल रही मगर मेरा लक्ष्य साफ है।


दुर्भाग्य से हर बार जंग
रामकरन के दुर्भाग्य ने उसे हर बार छला। मगर वह हार मानने वाला जीव नहीं। बचपन के दुर्भाग्य से लड़कर जब ट्रैक की राह पकड़ी तो पहली बार यही दुर्भाग्य फिर सामने आया। 2009 में यूएसए में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए रामकरन चयनित हो गए। मगर जब जाने की बारी आई तो पैर में फ्रेक्चर हो गया। 2012 में पैराओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया लेकिन प्रबंधन की लापरवाही कि आईसीसी लाइसेंस ही नहीं बन पाया, नतीजा वह फिर जाने से रह गए। रामकरन के पिता वीरेंद्र कहते हैं कि बड़ी मुश्किल से उसे पाला है। छुटपन से ही घर से दूर भेजना पड़ा और फिर खुद भूखे रहे। रामकरन की जिंदगी बन जाए इसके लिए पूरा परिवार दुर्भाग्य से लड़ता रहा।
भाई रामनरेश बताते हैं कि जब पहली बार रामकरन को छोड़ने दिल्ली गए तो उनकी आंखों में आंसू भर आए मगर करन अपनी धुन का पक्का निकला। उसने दिल्ली में ही रहने की ठानी। जाति प्रमाणपत्र न होने से किंगसेव कैंप अंध स्कूल में प्रवेश नहीं मिल पाया। ऐसे में लाजपत नगर स्थित प्राइवेट अंधविद्यालय में ही प्रवेश लेना पड़ा। दो साल बाद किंगसेव कैंप में प्रवेश का मौका मिला।
बेहमई गांव में रामकरन का परिवार।


बुधवार, 20 जून 2012

सिर उठाते सरगना

गेल इंडिया लिमिटेड के महाप्रबंधक को आखिर मुक्त करा ही लिया। अब जबकि वह सकुशल घर आ गए हैं समय है ठहर कर कुछ सवालों पर सोचने का। सवाल हमारी सड़कों और संपदा के सुरक्षित रहने का। सवाल प्रदेश के विकास की दशा और दिशा का। दफ्तर से घर लौटते समय गेल जीएम को जिस तरह सरे राह से उठा लिया गया वह यह सवाल तो खड़ा करता ही है कि हमारी सड़कें कितनी सुरक्षित हैं। बचाव पक्ष तर्क दे सकता है कि इस सबमें जीएम के ड्राइवर का हाथ था और व्यवस्था व्यक्तिवादी तरीके से सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती। यह एक हद तक ठीक भी है, लेकिन व्यवस्था का काम कानून का राज स्थापित करना है। यानी अपराधी के मन में कानून का डर इस कदर पैदा करना है कि वह अपराध करने से पहले कई बार सोचे। कानून का यह भय कठोर प्रशासक के जरिए ही आता है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि सत्ता प्रतिष्ठान केंद्र के बदले ही सरगना एक बार फिर सिर उठाने लगे हैं। क्या कारण है कि अपराधी जीएम को बिना किसी खौफ के 400 से अधिक किलोमीटर तक गाड़ी में घूमाते रहे। ताज्जुब यह कि इतनी दूरी हाइवे पर तय करने के दौरान इन्हें एक भी चेकिंग का सामना नहीं करना पड़ा। बेखौफ अपराधी अपहृत जीएम को साथ लेकर प्रदेश की सरहद भी पार कर गए। रात में आमतौर पर चेकिंग के नाम पर नजर आने वाले पुलिस वाले भी इन्हें नहीं मिले। सुकून सिर्फ इस बात का रहा कि इस पूरे घटनाक्रम का परिणाम सुखद निकला।
अब हम आते है दूसरे सवाल पर यानी कि प्रदेश के विकास की दशा और दिशा पर। गेल इंडिया लिमिटेड देश की प्रतिष्ठित नवरत्न कंपनी है। देश भर में प्राकृतिक गैस और उससे बनने वाले उत्पाद का काम इसी के हाथ में है। खरबों रुपए प्रति वर्ष टर्नओवर वाली इस कंपनी का देश की अर्थव्यवस्था के ऐसा स्थान है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। मुक्त अर्थव्यवस्था के बाद और उससे पहले भी किसी भी राज्य का विकास वहां के सुरक्षा माहौल और सड़क सुधार पर ही टिका होता है। जिन राज्यों ने इन दोनों बातों का ध्यान दिया है वह अधिक पूंजी आकर्षित कर सके हैं। प्रतिष्ठित संस्थान और पूंजीपति भी ऐसे ही राज्यों में जाना पसंद करते हैं जहां उसके कर्मचारी और उसकी पूंजी महफूज होती है। हिमाचल और गुजरात देश के ऐसे ही दो राज्य हैं। सवाल उठता है कि क्या उत्तरप्रदेश इन मानकों पर खरा उतरता है। क्या यहां सुरक्षा को लेकर लोग वैसा ही महसूस करते हैं। गेल के संदर्भ ने इस सवाल के उत्तर में ‘हां’ ने प्रश्न खड़े कर दिए हैं। व्यावसायिक संगठन जान और माल की जोखिम लेने को कतई तैयार नहीं होती है। गेल अफसर के अपहरण ने इस समुदाय के सामने यह सवाल तो खड़ा कर ही दिया है कि उन्हें अपनी सुरक्षा की गारंटी किससे लेनी होगी। आखिर व्यवस्था के रहनुमाओं को इस दिशा में सोचने की फुरसत कब मिलेगी।
             प्रदेश में जब विधानसभा चुनाव हो रहे थे तब कानून व्यवस्था मतदाता के एजेंडे में सबसे ऊपर था। प्रदेश की सत्ता में बैठी पार्टी ने तब प्रदेश भर के लोगों से क्षमायाचना के ढंग में विनती करते हुए बेहतर सुरक्षा व्यवस्था देने का वायदा किया था। अभी सपा ने सत्ता का कुछ ही सुख भोगा है। इस दौरान ही बार-बार कानून व्यवस्था का सवाल फिर खड़ा होने लगा है। अकेले गेल का ही मुद्दा क्यों। बीते कुछ सालों से शांत चल रहे बीहड़ में भी हलचल शुरू हो गई है। शिकोहाबाद से लेकर औरैया तक के बीहड़ में ‘फौजी गैंग’ की चहलकदमी जारी है। सूचना है कि इस गैंग के सदस्यों में दो लड़कियां भी है। इस गैंग ने मध्यप्रदेश के कुछ बदमाशों से हाथ मिला लिया है और ये ‘पकड़’ का आदान-प्रदान भी करते हैं। इस गैंग की गतिविधि का केंद्र वही इलाका है जहां कभी निर्भय गुर्जर, रज्जन गुर्जर, गंभीर यादव, सलीम की तूती बोलती थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस गैंग में एक भूतपूर्व गुर्जर डकैत का एक भतीजा भी शामिल है। आखिर इन अपराधियों को आक्सीजन कहां से मिल रही है। क्या कारण है कि बीते कुछ सालों से शांत चल रहे इन अपराधियों में फिर सुगबुगाहट है। यह वो सवाल है जिन्हें सुनकर बुरा लगने के बाद भी सत्ताधारियों को ठहरकर सोचने की जरूरत है। आखिर केंद्र की एक प्रतिष्ठित कंपनी के अफसर का अपहरण और फिर उसके एवज में एक करोड़ की फिरौती मानना इतनी मामूली बात भी नहीं है कि जिस पर चर्चा न की जाए। यह इसलिए भी कि जब केंद्र और राज्य के अधीन काम करने वाले अफसर ही सुरक्षित नहीं होंगे तो आम जनता की बात कौन करेगा। यही नहीं यह बौद्धिक संपदा पर भी आघात है। ऐसा आघात जो इसे पलायन पर मजबूर करती है। तब फिर प्रदेश के नुमाइंदे विकास के लिए वातावरण बना सकने वाली पूंजी कहां से लाएंगे। वह किस तरह से आश्वासन दे सकेंगे कि उनके इलाके में सब ठीक है। यानी ‘आल इज वेल’ कहने के लिए तब उनके पास कुछ नहीं होगा। सच तो यह है कि हम सब समय के ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां मूल्य बोध के सारी जानकारी होने के बाद भी हम मूल्यहीनता के शिकार हैं। फिर भला सरकारें इस मूल्यहीनता से कैसे बच सकती हैं।

सोमवार, 26 मार्च 2012

पान सिंह तोमर


पान सिंह तोमर इन दिनों चर्चा में है। उन पर बनी फिल्म ने काफी दर्शक जोड़े। पान सिंह तोमर का जीवन था ही कुछ ऐसा। उनका असली चित्र

बुधवार, 21 मार्च 2012

डकैत रमेश सिकरवार फिर बीहड़ में

80 के दशक के चंबल के बीहड़ को हिला देने वाला और आजीवन कारावास भुगतने के साथ सामान्य जिंदगी बिता रहा दस्यु रमेश सिकरवार एक बार फिर बीहड़ में कूद गया है। जीवन के छटवें दशक में चल रहे इस डकैत के जीवन में कुछ ऐसा घटा कि एक बार फिर इसने बंदूक उठा ली है।
दरअसल रमेश सिकरवार समर्पण के बाद 18 साल मुरैना जिले की सबलगढ़ जेल में बंद रहा। यहां से रिहा होने के बाद इसी जिले के विजयपुर कसबे के पास मिली कुछ जमीन पर वह खेती करके रहने लगा। इस इलाके में रावत जाति का बाहुल्य है और कांग्रेस और भाजपा दोनों की दलों के नेता और विधायक इसी जाति से हैं। बताते हैं कि इस कसबे के पास कैमाराकलां नाम के गांव में जमीन के कुछ हिस्से को लेकर सिकरवार के परिवार को रावत जाति के लोगों में विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ा कि इस घटना में रावत जाति के दो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस मामले में छह-सात लोगों को नामजद किया गया है जिनमें रमेश सिकरवार का भी नाम शामिल है। इसके बाद से ही रमेश सिकरवार अपने साथियों के साथ फरार है। अब पुलिस रिकार्ड में तो रमेश दो लोगों की हत्या का आरोपी हो ही गया है लेकिन कहते हैं इस घटना के दौरान वह स्वयं मौजूद नहीं था। उसके परिवारीजन अवश्य यहां थे। रावत जाति के विधायक और भाजपा-कांग्रेस नेताओं के दबाव में पुलिस ने रमेश को भी आरोपी बना लिया है। सच्चाई कुछ भी हो लेकिन एक बार फिर रमेश की दुनिया बीहड़ हो गई है।

सोमवार, 12 मार्च 2012

लापरवाही को कैसे कह दें शहीदी



एक बार फिर गलत कारणों से चंबल चर्चा में है। मुरैना जिले के बानमोर में ट्रैक्टर से कुचलकर हुए आईपीएस नरेंद्र की हत्या ने देश भर में कोहराम मचा दिया है। देश की आईपीएस लॉबी सख्त गुस्से में है। इससे मध्यप्रदेश सरकार की भी किरकिरी हुई है। हमार भी नरेंद्र और उनके परिवार से गहरी संवेदना है। साथ ही इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा भी करते हैं। यह भी कि जिले में पत्थर खनन का काम अवैध तरीके से तेजी में है। इस काम में असामाजिक तत्वों की सहभागिता भी है। मगर यहां जरा घटना पर ठहरकर कुछ सोचने की जरूरत है।
ठीक होली के दिन एक आईपीएस अफसर (जो अभी एसपी नहीं था) ड्यूटी पर अपना काम कर रहा था। जाहिर है कि उसके पास पुलिस का अमला और खुद की सर्विस रिवाल्वर भी थी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक इस अफसर ने पत्थर भरकर लाते ट्रैक्टर को हाथ दिया और जाहिर है कि चालक नहीं रूका। इस पर इस अफसर ने दौड़कर ट्रैक्टर का पीछा किया और उस पर चढ़ गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक धक्कामुक्की हुई और यह अफसर गिरकर ट्रैक्टर के नीचे आ गया। इससे उसकी मौत हो गई।
निसंदेह यह आपत्तिजनकर घटना है। इसकी अगर निंदा न की जाए तो असामाजिक तत्वों के हौंसले बुलंद होंगे लेकिन जरा आईपीएस स्तर के इस अफसर की कार्यशैली पर भी गौर करें। अगर आग में जानबूझकर कूदना दिलेरी है तो फ्रिर हर रोज आग से जलकर होने वाली आत्महत्या को क्या कहेंगे। अधिकार और ताकत होते हुए उसका उपयोग न कर तोप के सामने खड़े हो जाने को बहादुरी कैसे कह दिया जाए। अफसर के साथ अमला था। जिप्सी कार थी। वह खुद दौड़ने के बजाए अमले को पीछे लगा सकता था। अगर यह भी नहीं तो सर्विस रिवाल्वर से ट्रैक्टर के टायर को निशाना बना सकता है, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया गया।
इससे भी बड़ी बात यह कि अफसर के परिवारीजनों की ओर से एक विधायक के तार घटना से जुड़े होने के आरोप लगाए गए। कहा गया कि यह विधायक अफसर की आईएएस पत्नी पर किसी काम को लेकर दबाव बना रहा था। मगर यह कतई नहीं बताया गया कि उस विधायक का खनन से क्या संबंध है। या फिर इस घटना से उसका क्या ताल्लुक है। यही नहीं घटना के बाद इस इलाके में ‘खनन माफिया’ यह शब्द कई बार उछाला गया लेकिन एक भी रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया कि कौन माफिया है। कितने माफिया हैं और वह कहां-कहां सक्रिय हैं। यही नहीं जिस ट्रैक्टर से दुर्घटना हुई वह किस ‘माफिया’ से ताल्लुक रखता है।
यह सच है कि इस इलाके में अवैध पत्थर खनन होता है। यहां सीमेंट पत्थर की पहाड़िया हैं। साथ ही इमारत बनाने के काम आने वाला और कीमती पत्थर भी है। मगर इस अवैध खनन में जो असामाजिक तत्व लगे हैं उन्हें माफिया तो कतई नहीं कहा जा सकता। यह ऐसे असामाजिक लोग हैं जो अपनी राजनीतिक संबंधों का इस्तेमाल कर यह काम करते हैं। मगर इनकी गतिविधियां गिरोहबंद तो कतई नहीं हैं। ऐसे में घटना की गहराई में न जाकर जिस तरह के आरोप और प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं वह घटना को एक समस्या न बना राजनीतिक मसला बना दे रहे हैं। यही एक चिंता का सबब है।

सोमवार, 5 मार्च 2012

अस्सी हजार का इनामी राजेंद्र गुर्जर मारा गया




राजस्थान के धौलपुर जिला में बाड़ी क्षेत्र के थाना डांग बसई के बीहड़ में हुई मुठभेड़ में राजस्थान पुलिस ने 84 हजार का इनामी डकैत राजेन्द्र गुर्जर और उसका साथी रामअख्तर मार गिराने में कामयाबी हासिल की है। अंधेरे का लाभ उठाकर अन्य बदमाश भाग निकले। मुठभेड़ में गोली लगने से एक दरोगा भी घायल हुआ है। राजेंद्र सिंह पर उत्तरप्रदेश में 50, मध्यप्रदेश में 30 और राजस्थान में चार हजार का इनाम घोषित था। वह उत्तरप्रदेश में अधिक सक्रिय था और आगरा में उसके कई कैरियर काम करते थे।
थाना डांग बसई क्षेत्र के गांव नगर कोटरा के रविवार की रात राजेन्द्र डकैत गिरोह के ठहरे होने की पुलिस को जानकारी मिली। एसपी राहुल प्रकाश ने इस सूचना पर जंगल की घेराबंदी रात्रि को ही करा ली। पुलिस टीम की भनक लगते ही डकैतों ने फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस फायरिंग में दोनों डकैत मौके पर ही ढेर हो गये। इस मुठभेड़ में हाथ में गोली लगने से एएसआई रामवीर भी घायल हो गये। उनको स्वास्थ्य केन्द्र धौलपुर में भर्ती कराया गया है।
कुख्यात अपराधी राजेन्द्र पर धौलुपर जिले के कई थानों में पुलिस से मुठभेड़, हत्या के प्रयास, अपहरण जैसे एक दर्जन संगीन मामले दर्ज हैं। राजस्थान के अलावा यूपी, एमपी में हत्या के प्रयास, अपहरण जैसे तीन दर्जन से भी अधिक मामले दर्ज हैं। पिछले एक दशक से राजेन्द्र का यूपी, एमपी से अपहरण कर लाना और डांग बसई थाना क्षेत्र के जंगलो में रहकर बड़ी रकम लेकर फिरौती करना एकमात्र व्यवसाय बन चुका था। यूपी, एमपी पुलिस की ओर से इस पर आठ हजार रुपये का इनाम घोषित था। तीनों प्रदेशों की पुलिस को लम्बे समय से इसकी तलाश थी, लेकिन पुलिस को चकमा देकर भागने में इसे महारथ हासिल था। मुठभेड़ में मारे गये दोनों दस्युओं के शवों का बाड़ी सामुदायिक स्वाथ्य केन्द्र पर चिकित्सक ने सोमवार को पोस्टमार्टम किया और शवों को उनके परिजनों के सुपुर्द कर दिया है। पुलिस ने बताया कि मारे गये डकैतों के कब्जे से थी्र नोट थ्री की एक व 36 बोर के दो पचफेरा सहित भारी मात्रा में जिंदा कारतूस बरामद मिले हैं। गिरोह के अन्य सदस्य रात्रि में अंधेरा का फायदा उठाकर भागने में सफल रहे।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

अभ्यारण और राष्ट्रीय उद्यानों को जोड़ने को मंजूरी

राष्ट्रीय अभ्यारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना राजीव गांधी बायोस्फीयर रिजर्व गलियारे को राजस्थान राज्य मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। बुधवार को राज्य मंत्रिमंडल ने धौलपुर से झालावाड़ के बीच 11,000 वर्ग किलोमीटर में फैले क्षेत्र में बाघ और अन्य जंगली जानवरों को बेहतर वातावरण देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह गलियारा करौली, सवाई माधौपुर, कोटा, बूंदी, चित्तौड़गढ़ और बारां जिलों से गुजरेगा। इस प्रस्ताव को अनुमोदन के लिए केंद्रीय मंत्रालय और पर्यावरण को भेजा जाएगा।
वन और वन्य जीवन मंत्री बीना काक ने कहा कि इसके बाद चारदीवारी और बाड़ लगाने का काम शुरू किया जा सकेगा। पूर्व पीसीसीएफ आरएन मेहरोत्रा ने कहा कि यह अपनी तरह का पहला परिदृश्य मॉडल होगा।
यह कार्यक्रम यूनेस्को और बायोस्फीयर के तहत विकसित किया जा रहा है। इस संबंध में घोषणा जून में केंद्रीय और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जून मे की थी। इस योजना में रणथंभौर का मुकुंद्रा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान, कोटा का दर्राह वन्यजीव अभ्यारण, कैलादेवी सवाई मान सिंह अभ्यारण्य, सवाई माधौपुर अभ्यारण्य, भानसागर और जमालसागर अभ्यारण्य, रामगढ़ विशधारी अभ्यारण्य और चंबल अभ्यारण्य के कुछ वन क्षेत्रों में लागू होगा।
राज्य मंत्रिपरिषद ने Mukundra हिल्स राष्ट्रीय उद्यान के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अंतिम अधिसूचना के प्रकाशन के लिए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इस के साथ साथ, कैबिनेट के 37 परिवारों के पुनर्वास के लिए राष्ट्रीय पार्क में रुपये लाख प्रत्येक 10 के मुआवजे के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।