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बुधवार, 20 जून 2012

सिर उठाते सरगना

गेल इंडिया लिमिटेड के महाप्रबंधक को आखिर मुक्त करा ही लिया। अब जबकि वह सकुशल घर आ गए हैं समय है ठहर कर कुछ सवालों पर सोचने का। सवाल हमारी सड़कों और संपदा के सुरक्षित रहने का। सवाल प्रदेश के विकास की दशा और दिशा का। दफ्तर से घर लौटते समय गेल जीएम को जिस तरह सरे राह से उठा लिया गया वह यह सवाल तो खड़ा करता ही है कि हमारी सड़कें कितनी सुरक्षित हैं। बचाव पक्ष तर्क दे सकता है कि इस सबमें जीएम के ड्राइवर का हाथ था और व्यवस्था व्यक्तिवादी तरीके से सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती। यह एक हद तक ठीक भी है, लेकिन व्यवस्था का काम कानून का राज स्थापित करना है। यानी अपराधी के मन में कानून का डर इस कदर पैदा करना है कि वह अपराध करने से पहले कई बार सोचे। कानून का यह भय कठोर प्रशासक के जरिए ही आता है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि सत्ता प्रतिष्ठान केंद्र के बदले ही सरगना एक बार फिर सिर उठाने लगे हैं। क्या कारण है कि अपराधी जीएम को बिना किसी खौफ के 400 से अधिक किलोमीटर तक गाड़ी में घूमाते रहे। ताज्जुब यह कि इतनी दूरी हाइवे पर तय करने के दौरान इन्हें एक भी चेकिंग का सामना नहीं करना पड़ा। बेखौफ अपराधी अपहृत जीएम को साथ लेकर प्रदेश की सरहद भी पार कर गए। रात में आमतौर पर चेकिंग के नाम पर नजर आने वाले पुलिस वाले भी इन्हें नहीं मिले। सुकून सिर्फ इस बात का रहा कि इस पूरे घटनाक्रम का परिणाम सुखद निकला।
अब हम आते है दूसरे सवाल पर यानी कि प्रदेश के विकास की दशा और दिशा पर। गेल इंडिया लिमिटेड देश की प्रतिष्ठित नवरत्न कंपनी है। देश भर में प्राकृतिक गैस और उससे बनने वाले उत्पाद का काम इसी के हाथ में है। खरबों रुपए प्रति वर्ष टर्नओवर वाली इस कंपनी का देश की अर्थव्यवस्था के ऐसा स्थान है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। मुक्त अर्थव्यवस्था के बाद और उससे पहले भी किसी भी राज्य का विकास वहां के सुरक्षा माहौल और सड़क सुधार पर ही टिका होता है। जिन राज्यों ने इन दोनों बातों का ध्यान दिया है वह अधिक पूंजी आकर्षित कर सके हैं। प्रतिष्ठित संस्थान और पूंजीपति भी ऐसे ही राज्यों में जाना पसंद करते हैं जहां उसके कर्मचारी और उसकी पूंजी महफूज होती है। हिमाचल और गुजरात देश के ऐसे ही दो राज्य हैं। सवाल उठता है कि क्या उत्तरप्रदेश इन मानकों पर खरा उतरता है। क्या यहां सुरक्षा को लेकर लोग वैसा ही महसूस करते हैं। गेल के संदर्भ ने इस सवाल के उत्तर में ‘हां’ ने प्रश्न खड़े कर दिए हैं। व्यावसायिक संगठन जान और माल की जोखिम लेने को कतई तैयार नहीं होती है। गेल अफसर के अपहरण ने इस समुदाय के सामने यह सवाल तो खड़ा कर ही दिया है कि उन्हें अपनी सुरक्षा की गारंटी किससे लेनी होगी। आखिर व्यवस्था के रहनुमाओं को इस दिशा में सोचने की फुरसत कब मिलेगी।
             प्रदेश में जब विधानसभा चुनाव हो रहे थे तब कानून व्यवस्था मतदाता के एजेंडे में सबसे ऊपर था। प्रदेश की सत्ता में बैठी पार्टी ने तब प्रदेश भर के लोगों से क्षमायाचना के ढंग में विनती करते हुए बेहतर सुरक्षा व्यवस्था देने का वायदा किया था। अभी सपा ने सत्ता का कुछ ही सुख भोगा है। इस दौरान ही बार-बार कानून व्यवस्था का सवाल फिर खड़ा होने लगा है। अकेले गेल का ही मुद्दा क्यों। बीते कुछ सालों से शांत चल रहे बीहड़ में भी हलचल शुरू हो गई है। शिकोहाबाद से लेकर औरैया तक के बीहड़ में ‘फौजी गैंग’ की चहलकदमी जारी है। सूचना है कि इस गैंग के सदस्यों में दो लड़कियां भी है। इस गैंग ने मध्यप्रदेश के कुछ बदमाशों से हाथ मिला लिया है और ये ‘पकड़’ का आदान-प्रदान भी करते हैं। इस गैंग की गतिविधि का केंद्र वही इलाका है जहां कभी निर्भय गुर्जर, रज्जन गुर्जर, गंभीर यादव, सलीम की तूती बोलती थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस गैंग में एक भूतपूर्व गुर्जर डकैत का एक भतीजा भी शामिल है। आखिर इन अपराधियों को आक्सीजन कहां से मिल रही है। क्या कारण है कि बीते कुछ सालों से शांत चल रहे इन अपराधियों में फिर सुगबुगाहट है। यह वो सवाल है जिन्हें सुनकर बुरा लगने के बाद भी सत्ताधारियों को ठहरकर सोचने की जरूरत है। आखिर केंद्र की एक प्रतिष्ठित कंपनी के अफसर का अपहरण और फिर उसके एवज में एक करोड़ की फिरौती मानना इतनी मामूली बात भी नहीं है कि जिस पर चर्चा न की जाए। यह इसलिए भी कि जब केंद्र और राज्य के अधीन काम करने वाले अफसर ही सुरक्षित नहीं होंगे तो आम जनता की बात कौन करेगा। यही नहीं यह बौद्धिक संपदा पर भी आघात है। ऐसा आघात जो इसे पलायन पर मजबूर करती है। तब फिर प्रदेश के नुमाइंदे विकास के लिए वातावरण बना सकने वाली पूंजी कहां से लाएंगे। वह किस तरह से आश्वासन दे सकेंगे कि उनके इलाके में सब ठीक है। यानी ‘आल इज वेल’ कहने के लिए तब उनके पास कुछ नहीं होगा। सच तो यह है कि हम सब समय के ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां मूल्य बोध के सारी जानकारी होने के बाद भी हम मूल्यहीनता के शिकार हैं। फिर भला सरकारें इस मूल्यहीनता से कैसे बच सकती हैं।

रविवार, 29 नवंबर 2009

कोई तो रोके इनको

भिंड जिले के दबोह से किसी रीना ने बीहड़ पर यह पोस्ट छोड़ी है। उन्होंने इसी बीहड़ी इलाके की एक नई समस्या (हालांकि यह नई नहीं है) की ओर ध्यान खींचा है। उनके गांव में नौजवान मनचले किस कदर लड़कियों का निकलना मुशिकल किए हुएं हैं। रीना कहती हैं कि उन्होंने इस समस्या के बारे में एसपी से शिकायत की थी लेकिन कोई सुनता ही नहीं। अब बताइए गुंडा और डाकू कौन पैदा करता है समाज या पुलिस। रीना की पोस्ट जस की तस बीहड़ में प्रकाशित कर रहा हूं।
-योगेश जादौन
I kindly request to Bhind S.P that some boys of village deowrikala which comes in daboh thana are doing gundagiri ,they are troubling girls by doing bad signs and also by saying bad words like-chalegi kya ,daigi kya ,by singing bad songs ,please bhagvaan ke liye kuch tokijiye agar polish koi kudam nahi uthati hai to koi ladki majboor hokar kuch kur laige
gundo ke naam -
naraindra singh s/o daishpath singh
pushpaindra singh s/o jundail singh
chandu singh s/o raguraajsingh
sir in logo ki vajah se kuch logo ne gaun hi chod diya
so i kindly request you to catch them and punish them
thanks for readsing my complain