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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

 जगन गुर्जर मारा गया, अजमेर जेल में गला घोंटकर हत्या 

 
जगन गुर्जर मारा गया......कब....सोमवार 29 मई को.....कहां अजमेर की हाई-सिक्योरिटी जेल में.....कैसे.....इसका उत्तर आपको विचलित कर सकता है। उदास भी कर सकता है। कभी तीन राज्यों की पुलिस को हिला देने वाला, धौलपुर राजघराने को धमकी देने वाला, दस्यु सम्राट जगन गुर्जर को मामूली से अपराधी विष्णु ने तौलिये से गला घोंटकर मार डाला। कुख्यात डकैत जगन गुर्जर की जेल में ही उससे हाथापाई हुई। यह वारदात सोमवार 29 मई को सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच हुई।
जगन गुर्जर कोई मामूली अपराधी नहीं था। वह राजस्थान के धौलपुर जिले का रहने वाले था। उसके खिलाफ अलग-अलग पुलिस थानों में लगभग 100 मामले दर्ज थे। वह 2008 में तब चर्चा में आया जब उसने धौलपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का घर उड़ाने की धमकी दी थी। बाद में 2009 में उसने कांग्रेस नेता सचिन पायलट के सामने सरेंडर कर दिया था। जून 2019 में, गुर्जर को दो महिलाओं के साथ मारपीट करने और उनके कपड़े फाड़ने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. गुर्जर को पकड़ने के ऑपरेशन में लगभग 500 पुलिसकर्मी शामिल थे। 11 लाख रुपए के इनामी रहे पूर्व दस्यु जगन गुर्जर का राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा में आतंक फैला हुआ था।
अजमेर के SP हर्षवर्धन ने बताया, "शुरुआती जांच से पता चला है कि जेल के अंदर किसी मामूली बात पर दोनों के बीच हाथापाई हुई, जिसके बाद जगन गुर्जर की हत्या कर दी गई. आरोपी विष्णु, गुर्जर के साथ ही सेल में रह रहा था."
अजमेर हाई सिक्योरिटी जेल के अधीक्षक पारस जांगिड़ ने बताया कि जगन गुर्जर और आरोपी कैदी विष्णु दोनों एक ही बैरक (सेल) में बंद थे. जेल रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज के हवाले से उन्होंने बताया सुबह 11 बजे की रिकॉर्डिंग में यह साफ आया है कि दोनों कैदी मिलकर बैरक की साफ-सफाई कर रहे थे. सुबह 11 से दोपहर 3 बजे के बीच जब कैदियों को लॉक किया जाता है, उस दौरान वे साथ में लूडो भी खेल रहे थे. इसके बाद दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ, यह अभी गहन जांच का विषय है.
जेल के अधिकारी ने बताया, "उन्हें सुबह 11 बजे सेल में बंद किया गया था और जब दोपहर 3 बजे एक गार्ड सेल में गया, तो उसने उसे मृत पाया. शव पर चोट का कोई बाहरी निशान नहीं था." उन्होंने बताया कि विष्णु पिछले तीन साल से हाई-सिक्योरिटी जेल में बंद था, जबकि जगन गुर्जर को इस साल मार्च में इस जेल में ट्रांसफर किया गया था.
एसपी ने बताया कि पूछताछ के दौरान विष्णु ने तौलिए से जगन गुर्जर का गला घोंटने की बात कबूल की. उन्होंने कहा कि मामले की आगे जांच की जाएगी.
चाय देने पहुंचे संतरी के सामने आरोपी ने खुद कुबूला जुर्म
जेल प्रशासन को इस वारदात की भनक दोपहर 3 बजे लगी. रोजाना के नियम के अनुसार, जब जेल का संतरी दोपहर 3 बजे बैरक खोलने और चाय के समय कैदियों को जगाने के लिए पहुंचा, तो उसने देखा कि जगन गुर्जर अपने बिस्तर से नहीं उठा.
गमछे से घोंटा गला, शरीर पर चोट के निशान नहीं
संतरी ने जब बैरक में ही मौजूद दूसरे कैदी विष्णु से कड़क लहजे में पूछा कि "जगन क्यों नहीं उठ रहा है?", तो विष्णु ने बिना किसी डर के ठंडे दिमाग से खुद अपना जुर्म कुबूल कर लिया. विष्णु ने संतरी से सीधे कहा, "मैंने यह काम कर दिया है." इसके तुरंत बाद जेल में सायरन बजाया गया और वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया गया.

सचिन पायलट के कहने पर आत्मसमर्पण
कभी दूसरों को डराने वाला जगन गुर्जर अब खुद डर के साए में अजमेर जेल में था। कुख्यात डकैत जगन गुर्जर राजस्थान का खूंखार अपराधी रहा है। साल 2022 में बाड़ी विधानसभा क्षेत्र के विधायक गिर्राज सिंह मलिंगा को भी अशोभनीय भाषा बोलकर जान से मारने की धमकी दी थी।
उसके बाद पुलिस के दबाव को देखते हुए जगन गुर्जर ने 7 फरवरी 2022 की देर शाम को करौली पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। जगन के उत्पात को देखकर उसे अजमेर जेल में शिफ्ट कर दिया गया था। डकैत जगन गुर्जर ने अपनी गैंग के साथ करीब सात साल तक राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में जमकर आतंक मचाया था।

हत्या, अपहरण और लूट को लेकर तीनों राज्यों में जगन गुर्जर का खौफ कायम हो गया था। डकैत जगन ने वर्ष 2001 में तत्कालीन एसपी बीजू जॉर्ज जोसफ के सामने पहली बार आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद जमानत पर जेल से बाहर आ गया था और दोबारा अपना आतंक फैलाना शुरू कर दिया।
28 मई 2008 में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान जगन गुर्जर ने राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के महल को बम से उड़ाने की धमकी दी थी। इसके बाद इस पर 11 लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया। पुलिस से घबरा कर जगन गुर्जर ने 31 जनवरी 2009 को कैमरी गांव में राजस्थान के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

विधायक को दी थी जान से मारने की धमकी
वर्ष 2022 में बाड़ी विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेसी विधायक गिर्राज मलिंगा को धमकी देने के बाद जगन गुर्जर फिर से सुर्खियों में आ गया है और पुलिस ने जगन पर 50 हजार रूपये का इनाम घोषित कर दिया। पुलिस के दबाव को देखते हुए जगन गुर्जर ने 7 फरवरी 2022 की देर शाम को करौली पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था।
करीब 20 वर्ष से धौलपुर जिले के डांग और चंबल के बीहड़ों में अपराध की दुनिया में सक्रिय रहे डकैत जगन गुर्जर के खिलाफ 125 संगीन धाराओं में मुकदमे दर्ज थे। जगन गुर्जर राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में भी संगीन वारदातों को अंजाम दे चुका था।

तीन राज्यों की पुलिस हो गई थी फेल
खास बात ये है कि डकैत जगन गुर्जर को कभी 3 प्रदेशों की पुलिस पकड़ नहीं पाई। हर बार उसने खुद ही सरेंडर किया है। डकैत जगन ने वर्ष 2001 में तत्कालीन एसपी बीजू जॉर्ज जोसेफ के सामने समर्पण किया। उसके बाद 31 जनवरी 2009 को कैमरी गांव के जगन्नाथ मेला में पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के सामने समर्पण किया।
19 अगस्त 2018 को तत्कालीन आईजी मालिनी अग्रवाल के समक्ष समर्पण किया। 28 जून 2019 को धौलपुर एसपी के समक्ष समर्पण किया और 5 सितंबर 2021 को भी समर्पण किया। इसके बाद 7 फरवरी 2022 को करौली पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया था।
चंबल के बीहड़ सदियों से बागी, बजरी, बंदूक और बदमाशों के नाम से कुख्यात रहे हैं। चम्बल के बीहड़ो पर डकैतों के लिए यह भी कहा जाता हैं कि "एक मरे दो जावे,जाको वंश डूब ना पावे"वाली कहावत चरितार्थ होती हैं। सदियों से चंबल के बीहड़ को डकैतों की शरण स्थली माना जाता रहा है। चंबल के बीहड़ो में डकैतों की बंदूक कभी भी खामोश नहीं रही।

महिला डकैत पर आया दिल

जिले की एक खूबसूरत महिला भी डकैत जगन की गैंग में शामिल हुई थी। यह महिला थी कौमेश गुर्जर, जो बदले की आग में डकैत बन गई। धौलपुर जिले के नगर गांव के रहने वाले सरपंच छीतरिया गुर्जर के यहां 1986 में कौमेश का जन्म हुआ था। अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए 14 वर्ष की उम्र में ही कोमेश ने बंदूक थाम ली थी।
कोमेश अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहती थी, और बदले की आग में कोमेश गुर्जर चम्बल के बीहड़ों में कूद गई। बीहड़ो में कौमेश की मुलाक़ात डकैत जगन गुर्जर से हुई। कौमेश जगन गुर्जर को बचपन से जानती थी, क्योकि जगन कौमेश के घर पर आता-जाता रहता था और कौमेश जगन से प्यार करती थी।
बीहड़ में जाने के बाद खूबसूरत महिला दस्यु सुंदरी बन गई। डकैत जगन ने कोमेश को उसके पिता छीतरिया की हत्या का बदला लेने में मदद की थी और इसके बाद कौमेश ने पलट कर नहीं देखा।
वर्ष 2000 के आस-पास की बात है, जब कौमेश गर्भवती हुई और प्रसव के दौरान उसकी तबीयत बिगड़ने लगी तो कौमेश को अस्पताल ले जाने की नौबत आ गई। लेकिन डकैत जगन और उसके गिरोह के साथी अपनी जान खतरे में नहीं डाल सकते थे। इसके बाद कौमेश अकेले ही ऊंटों पर जंगलो से निकल कर हिंडौन सिटी पहुंच गई।
कौमेश को रास्ते भर जंगलो में जगन के लोगों और उसके रिश्तेदारों से मदद मिलती रही। कौमेश ने हिंडौन के नर्सिंग होम में पहले बच्चे को जन्म दिया। नर्सिंग होम से कुछ दिन बाद दस्यु सुंदरी कौमेश को डकैत जगन और उसके साथियों के सहयोग से ऊंटों पर बैठ बच्चे के साथ दोबारा बीहड़ों में पहुंच गई। साल 2008 में कौमेश बीहड़ो में दोबारा गर्भवती हुई और पुलिस ने गैंग को घेर लिया।
पुलिस की मुठभेड़ में एक गोली कौमेश को लग गई और घायल होने पर कौमेश को पुलिस ने पकड़ लिया। कौमेश के गोली लगने के बाद इलाज के दौरान पेट में पल रहे बच्चे की मौत हो गई। जेल से छूटने के बाद कौमेश ने एक बेटी को भी जन्म दिया। वर्ष 2014 की बात हैं कि कौमेश पुराने मामलों में डकैत जगन के साथ भरतपुर की जेल में बंद थी। तब कौमेश के छोटे भाई रामू की हत्या कर दी थी।
कौमेश को अपने भाई की हत्या का काफी दुख हुआ। जेल से बाहर आने के बाद कौमेश ने अपने भाई रामू की हत्या का बदला लेने के लिए अपने रिश्तेदार जंडेल गुर्जर के साथ मिलकर 21 अप्रैल 2020 को संजीत कोली की बाड़ी उप खंड के तिलुआ का अड्‌डा गांव में उसके घर में घुसकर उसके सिर में गोली मारकर हत्या कर दी। कौमेश पर दो ह्त्या समेत डेढ़ दर्जन से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं।
पूर्व दस्यु सुंदरी कौमेश को पुलिस जब जब धौलपुर कोर्ट में पेशी पर लाती थी तो उसे देखने के लिए कोर्ट में लोगो की भीड़ लग जाती थी। कौमेश वर्तमान में अपने बच्चो के साथ गांव में जीवन व्यतीत कर रही है।

जगन की हैं तीन पत्नियां
जगन गुर्जर की 3 पत्नियां हैं। जून 2010 में बेटी की शादी में जेल में बंद डकैत जगन को पुलिस प्रोटेक्शन में गांव लाया गया था। बेटी की शादी में डकैत जगन गुर्जर ने अपराध से दूर रहने की कसम खाई थी। करीब 8 साल जेल में रहने के बाद 6 मार्च 2017 को जगन गुर्जर जेल से बाहर आ गया। साल 2017 विधानसभा चुनाव में धौलपुर से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पत्नी ममता को चुनाव में उतारा।
चुनाव में पत्नी हार गई। जगन के उत्पात को देखकर उसे अजमेर जेल शिफ्ट कर दिया गया था। धौलपुर पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार कुख्यात दस्यु जगन गुर्जर के खिलाफ वर्ष 1994 में साधारण मारपीट का पहला प्रकरण दर्ज हुआ था, उसके बाद उसके खिलाफ कुल 125 आपराधिक मामले दर्ज हुए। फिलहाल जगन गुर्जर मार्च 2026 में थाना कोतवाली बाड़ी के मारपीट के मामले में जेल गया था।

शनिवार, 22 जुलाई 2023

चंबल के किनारे के 88 गांवों को बाढ़ के नाम पर विस्थापित नहीं किया जाए, बीहड़ की जमीन पर काबिज किसानों को पट्टे दिए जाएं। किसान सभा



सबलगढ़ (मुरैना): हाल ही में स्थानीय प्रशासन द्वारा चंबल के किनारे बसे हुए, जिले के 88 गांवों को विस्थापित करने तथा ऊपरी क्षेत्र में अति लघु आवासीय पट्टे देकर उन्हें हटाने की कार्यवाही शुरू कर दी है। जो किसान पीढ़ियों से चंबल के किनारे के गांवों में रह रहे हैं। अब आनन-फानन में उनको विस्थापित करने का आदेश पूरी तरह से न्याय के सिद्धांतों का उलंघन होकर अमानवीय है।

अब किसान कहां जाएंगे, आवास कैसे बनेंगे, उनकी आजीविका स्थानीय स्रोतों से ही संचालित है उसका विकल्प क्या होगा। इस संबंध में किसी तरह का कोई विचार-विमर्श किसानों से नहीं किया गया है और एकतरफा विस्थापन का आदेश जारी कर दिया है। किसानों ने इस आदेश के विरोध में लामबंद होकर इसका पुरजोर विरोध करने का निर्णय लिया है। किसान सैकड़ों की संख्या में मंडी में एकत्रित हुए रैली बनाकर तहसील चौराहे पर पहुंचे। जहां मुख्यमंत्री, कलेक्टर, अनुविभागीय अधिकारी सबलगढ़ के नाम ज्ञापन प्रस्तुत किए। ज्ञापन स्थानीय तहसीलदार महोदया ने लिए। साथ ही किसानों ने सैकड़ों की संख्या में चंबल बीहड़ की जमीन के पट्टे देने संबंधी आवेदन भी तहसीलदार महोदय को ज्ञापन के साथ दिए। 

इस दौरान किसानों की  आय सभा हुई। सभा को संबोधित करते हुए मध्य प्रदेश किसान सभा के अध्यक्ष अशोक तिवारी ने कहां कि प्रशासन को चंबल के किनारे बसे गांवों के विस्थापन संबंधी आदेश पर पुनर्विचार करना चाहिए और उसे निरस्त किया जाना चाहिए। किसान पीढ़ियों से निवासरत है। उन्हें चंबल बीहड़ की जमीन के पट्टे भी दिए जाने चाहिए। उन्हें विस्थापित नहीं किया जाए। साथ ही बाढ़ नियंत्रण की दिशा में भी प्रभावी कार्यवाही की जाए। किसानों की सभा को मध्य प्रदेश किसान सभा के जिला महासचिव मुरारी लाल धाकड़ ने संबोधित करते हुए आगामी दिनों में आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी। साथ ही 08 अगस्त को पुनः अनुविभागीय अधिकारी कार्यालय पर सत्याग्रह करने की घोषणा की।

किसान नेता गयाराम सिंह धाकड़, ओमप्रकाश श्रीवास ने किसानों की मांगों को जायज बताते हुए जुझारू आंदोलन की चेतावनी दी।

सभा को सर्वश्री छात्र नेता एसएफआई के प्रदेश अध्यक्ष राजवीर सिंह धाकड़, पूर्व पार्षद इब्राहिम शाह, किसान नेता राम प्रकाश सिंह जादौन, भान सिंह जादौन, हंसराज शर्मा, रघुवीर सिंह केवट, घमंडी केवट, हरिनंदन रावत आदि ने संबोधित किया।

किसानों ने आगामी दिनों में आंदोलन तेज करने का सर्वसम्मति से विनिश्चय किया है। इसके लिए चंबल क्षेत्र के सभी किसान बड़ी संख्या में परिवारों के साथ लामबंद होंगे।

रविवार, 19 जून 2022

चंबल की चमकीली रेत पर कटहल का प्यार















अथाह जलराशि के किनारे किलोमीटर तक फैली चांदी सी चमकीली रेत। कलरव करते परिंदें और किलोल भरते वनचर। आषाढ़ के सुहाने मौसम में चंबल के किनारे  गुलजार हैं। ऐसे में पंचनद पर कटहल महोत्सव का आयोजन माहौल  में एक  अलग ही रंग भर रहा है। इटावा-औरैया  जिले की सीमा पर पांच नदियों के संगम पर इन दिनों कटहल महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस तीन दिवसीय आयोजन का शनिवार को विधिवत उद्घाटन किया

कभी दहशत का पर्याय  रहा चंबल का इलाका इन दिनों पर्यटकों से  गुलजार है। चांदी सी चमकती रेत पर पर्यटकों  के तंबू लगे  हुए हैं। दरअसल, देश दुनिया में चंबल की छवि को बदलने के लिए यह आयोजन  चंबल फाउंडेशन की एक पहल है। फाउंडेशन चंबल की सकारात्मक पहचान विश्व के सामने लाने को कई वर्षों से अथक प्रयास कर रहा है। चंबल पर्यटन मुहिम के तहत यमुना, चंबल, सिंध, क्वारी और पहुज नदी के संगम पर जहां  कभी दिन में भी लोग जाने से कतराते थे, वहां का माहौल बदला नजर आ रहा है। चंबल की खूबसूरती को निहारने दूर दराज से सैलानी पहुंच रहे हैं। पांच नदि.यों के संगम के कारण यहां दूर तक फैली जलराशि तो है ही, नरम रेत का अहसास भी मिल रहा है। घटियाल और जलीय जीवों की बहुलता से कई दर्शनीय नजारे भी हैं। साथ ही, फाउंडेशन ने यहां रात्रि में रुकने और सूक्ष्म राफ्टिंग का भी इंतजाम किया है। रात में संगीत की महफिल भी लगती है। पहली बार हो रहे इस आयोजन महिला-पुरुष पर्यटक कैंपों में रात भी बिता रहे हैं। चंबल के इस इलाके में कटहल की पैदावार खूब होती है। इस तरह यह आयोजन कटहल की पैदावार को बढ़ाने का भी संदेश दे रहा है। महोत्सव में कटहल  के लजीज व्यंजन का लुत्फ उठाने की भी व्यवस्था की गई है। महोत्सव में कई प्रदेशों से लाए गए कटहल की प्रदर्शनी लगाई गई है। यहां चंबल के बीहड़ में पैदा हुआ  सबसे बड़े आकार का कटहल भी  देखने को रखा गया है।  करीब पौने चार फीट लंबा यह कटहल २३ किलो वजन का है। वहीं थाईलैंड का रंगीन  कटहल भी देखने को रखा गया है। कटहल की पूरे विश्व में मांग को देखते हुए बीहड़वासियों से इसका पौधा लगाने की अपील भी की जा रही है। विश्व के तमाम देशों में पका  कटहल खाने का चलन है मगर, चंबल में पका  कटहल  नहीं खाया जाता है। महोत्सव में पके कटहल को खाने के बारे में भी बताया  जा रहा है। पक्के कटहल का स्वाद केला और अन्नास के स्वाद जैसा होता है। महोत्सव में योग भी कराया जा  रहा है। रविवार को पंचनद योग महासंगम की संयोजक स्वेच्छा दीक्षित ने चंबल की रेत  में योग के विविध  आसन कराए।  दस्यु सरगना रहे सलीम गुर्जर उर्फ पहलवान के गांव के नजदीक सिंध नदी में राफ्टिंग की गई। सिंध नदी का प्रवाह यहां तेज होने से राफ्टिंग रोमांच से भर देती है। चंबल परिवार प्रमुख शाह आलम राना ने बताया, सिंध नदी में राफ्टिंग का यह सफल प्रयोग सूबे की पहली राफ्टिंग के लिए जानी  जाएगी। पचनद के किनारे यह पहला  आयोजन ही बहुत कुछ कहता है। यह भविष्य की वह तस्वीर भी दिखाता है  जिस पर बीहड़वासी आने वाले दिनों में गर्व कर सकेंगे। नदी, बीहड़ और प्राकतिक नजारों के आग्रही  को एक बार यहां जरूर आना चाहिए।

रविवार, 16 मई 2021

कोविड की आड में जारी है ,चंबल के बीहड़ को लूटने की साजिशें , और षड्यंत्र



कोविड महामारी का भीषण प्रकोप जारी है। प्रतिदिन चार लाख से ज्यादा मरीज देशभर में निकल रहे हैं। जिनमें से लगभग 4 हजार की मौत हो रही है। यह आंकड़े वास्तविक आंकड़ों से काफी कम है। ऐसा विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह संख्या 4 गुना से 5 गुना ज्यादा हो सकती है। सही आंकड़े दर्शाए नहीं जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से भी मुरैना जिले में कोविड से हुई मोतों का आंकड़ा एक सैकड़ा के करीब पहुंच गया है। जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। महामारी आपदा जारी है । परंतु मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार इसकी आड़ में चंबल के बीहड़ की जमीन लूटने का "खेला" नई - नई साजिशें  और षडयंत्र रच रही है। हाल ही में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की सबलगढ़ तहसील के 10 गांवों की चंबल के बीहड़ की 600 हेक्टेयर जमीन  ग्राम बधरेंटा में वन विभाग की भूमि पर लगाए जा रहे रक्षा अनुसंधान (डीआरडीओ) के प्रोजेक्ट के एवज में वन विभाग को आवंटित की है। जो चंबल के बीहड़ की भूमि आवंटित की गई है उस भूमि पर सबलगढ़ तहसील के ग्राम रेंमजा का पुरा ,रहू का गांव, खेरो, खिरकारी, लक्ष्मणपुरा, देवलपुरा ,डिगवार,  अटार आदि गांवों के लगभग 1 हजार परिवार पीढ़ियों से  काश्तकारी कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। उन्होंने कुदाल, फावड़ों, हल बैलों और शारीरिक श्रम से ऊंचे ऊंचे बीहड़ों को समतल कर कृषि योग्य बनाया है। इन परिवारों को उजाडा जा रहा है । अभी हाल ही में अटार गांव के दर्जनभर परिवारों के आवासों को स्थानीय प्रशासन द्वारा तोड़ दिया गया। ट्यूवबैल्स की लाइट बंद कर दी गई है। किसानों को पीड़ित किया जा रहा है। प्रभावित किसानों में ज्यादातर केवट मल्लाह, रावत, पिछड़ी जातियों के ही परिवार हैं। इन परिवारों ने स्थानीय तहसील कार्यालय से लेकर जिला मुख्यालय तक कई बार धरना ,प्रदर्शन, सत्याग्रह कर अपनी मांगों को उठाया है। किसानों की मांग है कि वन विभाग को जमीन अन्यंत्र आवंटित की जाए और बीहड़ की जमीन पर काबिल किसानों को पट्टे दिए जाएं । विगत दिनों मुरैना कलेक्टर द्वारा समस्या की गंभीरता को देखते हुए किसानों को यह आश्वस्त किया है कि जांच करवा कर उक्त भूमि को छोड़कर अन्यत्र भूमि आवंटित की जाएगी । परंतु प्रशासनिक एवं राजनैतिक अवरोधों के चलते अभी तक यह कार्यवाही मूर्त रूप नहीं ले पाई है। एक तरफ किसान कोविड की महामारी से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर उन्हें जमीन से उजाड़ कर भूखों मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा । क्योंकि चंबल के बीहड़ों में अन्य कोई रोजगार का जरिया नहीं है न हीं कोई उद्योग है और न ही कोई अन्य कारोबार है । यह किसान परिवारों के जीवन को बचाने का संघर्ष है। किसानों ने भी संकल्प लिया है कि वह बीहड़ की जमीन को लूटने की हर साजिश व षडयंत्र को बेनकाब करेंगे और हर हाल में जमीन को बचाएंगे। अभी यह परीक्षण है। अगर इसमें सरकार व कंम्पनियां सफल होती हैं तो आगे आने वाला समय चंबल के बीहड़ की जमीन के लिए बहुत ही घातक साबित होने वाला है।

*बीहड़ की जमीन को लूटने की साजिशें पूर्व में भी हुई असफल*

===============चंबल नदी मध्य भारत में यमुना नदी की सहायक नदी है। यह 'जानापाव पर्वत" के बाचू पॉइंट मऊ से निकलती है। इस की सहायक नदियां शिप्रा, सिंध, कालीसिंध , पार्वती और कूनो  हैं। इसकी लंबाई 1024 किलोमीटर है। यह राजस्थान में चित्तौड़गढ़, कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर और धौलपुर जिलों से होकर बहती है। मध्यप्रदेश में धार ,उज्जैन ,रतलाम, मंदसौर ,श्योपुर कलां, भिंड, मुरैना से होकर बहती है। यह चंबल नदी कावेरी, यमुना, सिंध ,पहुंज नदियों के साथ में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के बरेह में, मध्य प्रदेश के भिंड जिले की सीमा पर शामिल पांच नदियों के संगम में" पचनदा" में शामिल होकर समाप्त हो जाती है। चंबल नदी का कुल अपवाह बेसिन क्षेत्र 19,500 किलोमीटर है। यह वह भूभाग है जिसमें एक ही दिशा में धरातल पर जलवाहित होता है।

चंबल घाटी का नाम आते ही एक अलग तरह की छवि नजरों के सामने से घूम जाती है। यह छवि जिसमें डकैत लुटेरों के गिरोह( गैंग )हैं। जो लूट, डकैती ,हत्या करने वाले उत्पाती तत्वों का जमावड़ा है। जो नृशंस कृत्यों को अंजाम देता है। यह अत्यंत भयावह व खतरनाक क्षेत्र है। इस तरह की छवि हिंदी सिनेमा और हिंदी मीडिया के एक हिस्से द्वारा बनाई गई है। जो पूरी तरह से सच नहीं है। यह बात सही है कि चंबल घाटी में बहुत ही दुर्दांत दस्यु व दस्यु सरगना हुए हैं। जिन्होंने सैकड़ों हत्याओं सहित हजारों जघन्य अपराधों को अंजाम दिया है। परंतु यह तस्वीर का एक पहलू है। दूसरा पक्ष वह भी है, जिसमें उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि हम सिस्टम (व्यवस्था ) की प्रताड़ना के चलते हथियार उठाने को मजबूर हुए। हम डाकू नहीं, हम बागी हैं। हम व्यवस्था के विरोधी हैं। इसलिए हमें गलत छवि के रूप में नहीं देखा जाए। चंबल घाटी में सैकड़ों सदस्यों के डकैत गिरोह रहे हैं । जो किसी जमाने में आतंक का पर्याय हुआ करते थे। जिनमें मानसिंह, तहसीलदार सिंह, पान सिंह, सूबेदार सिंह, लुक्का डाकू, सुल्ताना डाकू, पन्ना, पान सिंह तोमर, डाकू पंचम सिंह, डोंगर सिंह बटरी सिंह, अमृतलाल, मोहर सिंह, माधो सिंह, मलखान सिंह, बाबा मुस्तकीन, विक्रम मल्लाह, श्रीराम लालाराम, जगजीवन परिहार ,रमेश सिकरवार, रूपा पंडित, निर्भय सिंह गुर्जर जैसे नामी-गिरामी दस्यु सरदार हुए हैं। जिनकी गिरोहों में सैकड़ों डकैत शामिल रहे हैं। चंबल घाटी में महिला दस्यु भी बड़ी संख्या में रही है। जिनमें पुतलीबाई, फूलन देवी, सीमा परिहार, कुसमा नाइन, रेनू यादव के नाम उल्लेखनीय हैं। दो बार डकैत गिरोहों द्वारा आत्मसमर्पण भी किया गया । जिनमें सैकड़ों की संख्या में दस्युयों ने आत्मसमर्पण किया। लंबे समय तक डकैत समस्या के विरोध में आंदोलन भी हुए हैं। हालांकि वर्तमान में चंबल घाटी में डकैत समस्या नगण्य  है।

चंबल घाटी में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की दस्तक भी रही है। जिनमें पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की जन्मभूमि रुअर बरवाई है, इनके अलावा निरंजन सिंह, गेंदालाल दीक्षित, लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी, भारत वीर मुकंदी लाल सहित बड़ी संख्या में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए हैं।  इस लेख में हम वर्तमान में चंबल क्षेत्र की स्थिति के बारे में और चंबल की जमीन को लूटने के लिए लपकते कॉरपोरेट गिद्धों के बारे में चर्चा करना चाहते हैं। चंबल का बीहड़ लगभग 3लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह जमीन अच्छी उपजाऊ और बेशकीमती जमीन है। इस जमीन को कंपनियां सरकार के सहयोग से हडपना चाहती हैं। इसके लगातार प्रयास किए जाते रहे हैं ।लेकिन अभी तक जन संघर्षों/जन आंदोलनों के जरिए उन्हें असफल किया गया है। जिसमें सन 1995 में चंबल अभ्यारण के नाम पर श्योपुर कलां जिले के "बड़ोदिया बिंदी" गांव से लेकर भिंड जिले के अटेर तहसील के "चापक" गांव तक चंबल के किनारे से 1 किलोमीटर की जमीन घडियालों के लिए "चंबल अभ्यारण" के नाम पर अधिग्रहीत की गई । इस भूमि से लगभग 300 गांवों को विस्थापित किए जाने की कार्यवाही शुरू हुई। तत्समय किसानों ने अखिल भारतीय किसान सभा/ मध्य प्रदेश किसान सभा के नेतृत्व में जुझारू संघर्ष किए। दर्जनों पद यात्राएं आयोजित की गई। प्रदर्शन, सत्याग्रह, आंदोलन किए गए। जिसके चलते तत्कालीन सरकार द्वारा इस अभ्यारण को चंबल के रेत तक सीमित करने की घोषणा की और गांव  उजड़ने से बच गए। जो आज तक भी बचे हुए हैं। लेकिन यहीं तक कार्यवाही नहीं रुकी। बाद में अमेरिकन कंपनी मैक्स बर्थ द्वारा जमीन को लेने के लिए प्रयास किए । सरकार द्वारा भूमि आवंटन का निर्णय लिया गया। उसके खिलाफ भी चंबल से फिर किसान उठे, दिल्ली संसद तक संघर्ष की गूंज पहुंची।   तत्समय प्रसिद्ध, लोक ख्यात ,वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने हस्तक्षेप करते हुए तत्कालीन कृषि मंत्री को पत्र लिखकर आवंटन रद्द करने का आग्रह किया। जिसके चलते मैक्स बर्थ को जमीन का आवंटन रद्द किया गया। यह किसानों की बहुत बड़ी जीत हुई ।इस बीच में रिटायर्ड सैनिकों का टास्क फोर्स बनाकर भी जमीन लेने का प्रयास हुआ जो कामयाब नहीं हो सका। सन 2008 में मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने यह घोषणा की कॉरपोरेट कंपनियां जिस जमीन पर उंगली रख देंगी, वह जमीन उनको आवंटित कर दी जाएगी । इसी क्रम में 50 हजार बीघा जमीन पांच कॉरपोरेट कंपनियों को आवंटित की गई। जिसमें 10 हजार बीघा जमीन भाजपा के औद्योगिक प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष रमेश गर्ग  मुरैना को भी आवंटित की गई। किसानों ने फिर हुंकार भरी, संघर्ष हुए कंपनियों को जमीन पर कब्जा नहीं लेने दिया। अंततः 3-4 वर्षो के संघर्ष के बाद कंपनियों के पट्टे निरस्त कराये गए। अब फिर नए सिरे से जमीन को लूटने की कोशिशें की जा रही है। जो दो तरह से हैं। इसके बारे में आगे उल्लेख किया गया है।

  *चंबल के बीहड़ की जमीन को लूटने की तैयारी*।

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चंबल के बीहड़ की लगभग 3 लाख हेक्टेयर जमीन को लूटने की कई तरह से तैयारियां की जा रही है। जिन में फिलहाल  दो तरीकों से जमीन को लूटने की तैयारी है -

अ-चंबल एक्सप्रेस वे के नाम पर 

ब- विश्व बैंक से ऋण लेकर समतलीकरण कर कंपनियों को आवंटन के जरिए।                    (अ)-चंबल एक्सप्रेस वे के नाम पर जमीन लेने की बड़ी तैयारी है।

=============== मुरैना जिले में पहले से ही 552 नंबर राष्ट्रीय राजमार्ग संचालित है। इसके अलावा चंबल नहर पर पूर्व से ही सीमेंट कंक्रीट की सडक बनी हुई है। इसके बाद भी चंबल के बीहड़ से भिंड जिले के अटेर से लेकर श्योपुर कलां होते हुए आगे तक एक्सप्रेस वे का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है।     चंबल एक्सप्रेस वे जिसका नाम बदलकर बाद में अटल एक्सप्रेस वे कर दिया गया है। इसकी लंबाई लगभग 406 किलोमीटर होगी। एक्सप्रेस वे भिंड, मुरैना, श्योपुर कलां होते हुए राजस्थान में खातोली, इटावा, सुल्तानपुर के रास्ते डिगोद (कोटा)  एनएच 27 से जुड़ेगा। इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग 800 करोड रुपए आंकी गई है। इसके लिए सर्वेक्षण का कार्य प्रारंभ किया गया है। बड़ी मात्रा में भूमि अधिग्रहण होना है। अधिग्रहित भूमि में 52% भूमि सरकारी भूमि तथा 48% निजी भूमि होगी। निजी भूमि में स्वत्वधारी भूमि स्वामी किसानों की संख्या बहुत ही नगण्य  है। जिन किसान परिवारों की जमीन ली जाएगी। उन्हें जमीन के बदले जमीन दी जाएगी ऐसा कहा जा रहा है। यदि कोई किसान परिवार जमीन के बदले जमीन नहीं लेना चाहता है। तो उन्हें भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार नगदी मुआवजा बाजार मूल्य से 3 गुने से 5 गुना मिलना चाहिए, इसका प्रावधान है। परंतु इस पर सरकार अमल नहीं कर रही है। किसानों के साथ छलावा किया जा रहा है। किसान इसका लगातार विरोध भी कर रहे हैं। इसी तरह जो सरकारी जमीन बताई जा रही है। उसके बड़े भूभाग पर पीढ़ियों से लगभग 50 हजार किसान परिवार काश्तकारी कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं तथा आवास बनाकर रह रहे हैं न तो उन परिवारों का सर्वे किया जा रहा है। और न ही उन्हें किसी तरह का मुआवजा या जमीन के बदले जमीन  देने का प्रावधान रखा गया है। जो किसान परिवार विस्थापित होंगे। उनके सामने भीषण भुखमरी का संकट निर्मित हो जाएगा। लेकिन सरकार इस मुद्दे को नजरअंदाज कर रही है। यहां तक कि यह जो एक्सप्रेसवे बनाए जा रहा है। इसका निर्माण राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण करेगा या बी ओ टी के अंतर्गत  कराया जाएगा । इसके बारे में भी अभी कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं हुआ है। चंबल अभ्यारण जो घडियालों को संरक्षित करने के लिए बनाया गया है। उसके एरिया को छोड़कर उस से 2 किलोमीटर आगे, दूरी पर  से एक्सप्रेस-वे का निर्माण होगा। यह एक्सप्रेस वे अभी 6 लेन का होगा बाद में इसे बढ़ाकर 8 लेन कर दिया जाएगा। यहां तक कि एक्सप्रेस वे के दोनों ओर एक 1 किलोमीटर से अधिक भूमि रिजर्व रखी जाएगी । जिसमें सेवा से जुड़े कई उद्योग इकाइयां लगाने के साथ-साथ , औद्योगिक पार्क स्थापित किए जाने की भी योजना है ।इसके अलावा बस पोर्ट और चालक प्रशिक्षण केंद्र खोलने के प्रस्ताव भी केंद्र सरकार द्वारा मांगे गए है। चंबल एक्सप्रेस वे पर लॉजिस्टिक पार्क स्थापित करने की भी योजना बताई जाती है। उक्त समस्त गतिविधियों को कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा अंजाम दिया जाएगा। कुल मिलाकर लाखों हेक्टेयर चंबल के बीहड़ की बेशकीमती जमीन को लूटने की योजना बनाई जा रही है। इससे पर्यावरण को भी खतरा पैदा होगा। अतः हम मांग करते हैं कि उक्त जमीन समतल करवा कर काबिज किसानों को पट्टे दिए जाए । इसके अलावा अतिरिक्त जमीन गरीब और भूमिहीन किसानों में आवंटित की जाए। कंपनियों को चंबल के बीहड की जमीन लूटने की छूट नहीं दी जाए।    *(ब) विश्व बैंक से ऋण लेकर समतलीकरण कर कंपनियों को आवंटित करने के जरिए*

===============चंबल के बीहड़ की ही नहीं जहां-जहां भी बीहड़, जंगलात, उबड़ खाबड़, बिगड़ी हुई जमीन है। उस समस्त जमीन को कॉरपोरेट्स को देने, हड़पने ,एग्रो बिजनेस पर कब्जा जमाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। कॉरपोरेट राजनेता और नौकरशाहों का गठबंधन इस कार्य को अंजाम देने में लगा हुआ है। इसके लिए पूर्व से ही भूमि हदबंदी कानूनों को बदला जा चुका है। अब कोई भी कंपनी , व्यक्ति या संस्था उद्यानिकी, मत्स्य पालन, वृक्षारोपण, आदि गतिविधियों के नाम पर कितनी भी जमीन ले सकती है। इस तरह से जमीन की लूट का रास्ता खुल गया है। अभी हाल ही में भिंड, मुरैना, श्योपुर कलां जिलों की चंबल के बीहड़ की लगभग 3 लाख हेक्टेयर भूमि को समतलीकरण कर कंपनियों को आवंटित करने की तैयारी की जा रही है। यह परियोजना चंबल एक्सप्रेस वे की पूरक परियोजना ही है। गत वर्ष केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने विश्व बैंक के वरिष्ठ प्रतिनिधि और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मीटिंग कर  चंबल के  बीहड़ों की 3 लाख हेक्टेयर जमीन के विकास के लिए परियोजना तैयार करने के लिए सहमति विकसित की है। इस संबंध में पार्लियामेंट्री प्रोजेक्ट रिपोर्ट पेश होनी है। जिस पर राज्य सरकार की मोहर लगने के बाद कार्यवाही आगे बढ़ेगी। यह कार्यवाही जारी है। चंबल एक्सप्रेस वे को इसके साथ जोड़ते हुए नरेंद्र सिंह तोमर कहते हैं यह सब के पूरा होने से ही बीहड़ क्षेत्र का विकास होगा। इस कथित विकास के पीछे कॉरपोरेट्स की घुसपैठ के अलावा और कुछ नहीं है। इससे स्थानीय किसान विस्थापित और तबाह हो जाएंगे। पूर्व में भी इसी तरह की कई योजनाएं ,परियोजनाएं बनाई गई। लेकिन मूर्त रूप नहीं ले सकी। इस परियोजना को अमल कराने की तैयारीयां लगातार जारी हैं। चंबल क्षेत्र के लिहाज से यह आवश्यक है कि चंबल के बीहड़ की जमीन भूमिहीन गरीब किसानों को आवंटित हो तथा समतलीकरण के लिए किसानों को आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाए । यदि यह संभव नहीं होता है सरकार ही समतलीकरण करवाती है। तो भी बीहड़ की जमीन किसानों को ही आवंटित की जाए। यदि यह नहीं किया गया तो विश्व बैंक से ऋण लेकर जिस परियोजना के अंतर्गत जमीन समतलीकरण किया जाएगा। उसके आगे के चरण में जमीन कॉरपोरेट कंपनियों को दी जाएगी । जिससे स्थानीय किसान उस पर बंधुआ मजदूर होकर रह जाएंगे। इसके चंबल घाटी में नया असंतोष का जन्म लेगा। जो चंबल क्षेत्र के लिए और चंबल घाटी के लिए ठीक नहीं है। सरकार के मंसूबों को जनता के बीच उजागर करना होगा और बीहड की जमीन की लूट को बचाने के लिए आगे आना होगा।  हाल ही में सबलगढ़ के 10 गांव  की जमीन को लेने के नाम पर "लिटमस टेस्ट" किया जा रहा है। यदि जनता सड़कों पर नहीं उतरी और जमीन नहीं बची तो फिर आगे जमीन की लूट की कोशिशों को ओर तेज किया जाएगा। इसलिए यह जमीन को बचाने का संघर्ष अत्यंत जरूरी है।  आज जब भीषण कोरोना महामारी का दौर चल रहा है।  ठीक से लाशें भी नहीं उठाई जा रही है। तब भी सरकार आपदा में अवसर ढूंढ रही है और चम्बल के बीहड़ की जमीन को लूटने की साज़िशें और षडयंत्र लगातार रच रही हैं। आइए इसे उजागर करें और इसकी मुखालफत करें ।

शनिवार, 6 मार्च 2021

पर्यटन की उम्मीद जगाती खौफ की नदी



डेढ़ दशक पहले तक खौफ का पर्याय रही चंबल नदी आज पर्यटन की उम्मीद जगा रही है। प्रकृति प्रेमी के साथ सरकार की निगाह भी इस पर टिक गई है। दस्यु दलों को पनाह देती रही देश की यह सबसे साफ नदियों में शुमार यह डाल्फिन, घड़ियाल और आठ तरह के कछुओं की शरणस्थली बन गई है। इसके किनारे विलुप्त श्रेणी में शुमार कई पक्षी भी डेरा डाले हुए हैं।
चंबल के बीहड़ हमेशा से लुभाते रहे हैं। मगर, दस्यु दलों के खौफ से लोग इसमें कदम रखते कांपते थे। करीब डेढ़ दशक पहले चंबल के बीहड़ से दस्यु दलों के सफाए और बाद में इटावा में लायन सफारी बनने के बाद यहां पर्यटन की संभावना को पर लग गए हैं। वर्ष 1979 में चंबल के राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश राज्य के पांच हजार 400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चंबल घड़ियाल वन्यजीव सेंक्चुरी घोषित किया गया था। इसके बाद चंबल में घड़ियाल और डाल्फिन की संख्या बढ़ने लगी। इसमें लायन सफारी के मिल जाने से पयर्टन का एक एेसा सर्किट तैयार हुआ है जो चंबल के बीहड को देखने की ख्वाहिश रखने वालों का ध्यान खींच रहा है। इटावा की लायन सफारी में एशियन शेर की संख्या 11 हो गई है। इससे, इटावा के पचनद से लेकर मध्यप्रदेश के मुरैना तक करीब 150 किलोमीटर चंबल के इलाके में प्रकृति के शौकीनों की आमदरफ्त बढ़ी है।
पूरे देश की नदियां जहां पानी की कमी और प्रदूषण की मार से जूझ रही हैं ऐसे संकट के समय में भी चंबल नदी उम्मीद जगा रही है। चंबल का पानी इस इलाके में साफ और गंधहीन है। मध्यप्रदेश प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक इसका पानी आज भी पीने योग्य पाया गया है। पानी में बायोलाजिकल आक्सीजन डिमांड का आकंडा बेहद कम है और घुलनशील आक्सीजन का स्तर मानक 4 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक यानी बेहतर पाया गया है। चंबल के पानी की यह संरचना डाल्फिन, घड़ियाल जैसे जलीय जीवों के साथ साइबेरियन पक्षियों को भा रही है।

यह नदी आज ऐसे जलचरों का आवास बनी है जिन्हें विलुप्त श्रेणी के ए वर्ग में दर्ज किया गया है। ए यानी ऐसा वर्ग जिस पर खतरा सबसे अधिक है। कई जलचर तो ऐसे है जो सिर्फ इसी नदी में पाए जाते हैं। आठ प्रजाति के कछुआ ढोंगेंका, टेटोरिया, ट्राइनेस, लेसीमान पंटाटा, चित्रा एंडका और इंडेजर, ओट्टर के साथ ही एलिगेटर की दो प्रजाति वाले घड़ियाल, मगर और गंगा डाल्फिन का चंबल स्थायी आवास बन चुकी है। इसके साथ ही ब्लैक बेलिएड टर्नस, सारस, क्रेन, स्ट्रॉक पक्षी इन नदी में कलरव करते हैं। स्कीमर पक्षी तो सिर्फ चंबल में ही पाया जाता है।
- शाह आलम, फाउंडर, चंबल फाउंडेशन

कहां, क्या देख सकते हैंः
- करीब 320 किस्म की देशी विदेशी चिड़िया पांच नदियों के संगम पचनद तट औरैया, इटावा, जालौन जिले की सीमा पर देखा जा सकता है।
-चंबल नदी में दुनियां के 80 फीसद घड़ियालो का बसेरा है। उदी, इटावा चंबल तट पर चंबल वैली बर्ड वाचिंग एंड क्रोकोडाइल रिसर्च सेंटर पर भी यह रोमांचकारी नज़ारा देख सकते हैं।
- आठ  किस्म के कछुए यहां देखने को मिलते हैं, जो दुर्लभ प्रजाति के हैं। इटावा के सहसो में इन्हें आसानी से देखा जा सकता है।
- डॉल्फिन और मगरमच्छ आगरा के पिनाहट में भी बारहा दिखते हैं।
- अटेर, भिंड में बड़े पैमाने पर घड़ियाल चंबल तटों पर दिखते हैं। मुरैना में डॉल्फिन पॉइंट भी है।
- मुरैना(मध्यप्रदेश) के देवरी में घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुए की हेचरी भी है।


चंबल के पानी की स्थितिः
मप्र राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से 2017 में किए गए अध्ययन की रिपोर्ट के मुताबिक मुरैना-धौलपुर के पास राजघाट चंबल के इलाके में चंबल का ए ग्रेड पानी है। नीमच से उज्जैन तक पानी बी से लेकर डी और ई ग्रेड का है। पीने योग्य पानी में हार्डनेस की उच्चतम मात्रा 1000 मिलीग्राम प्रति लीटर की तुलना में यह केवल 72 और मैग्नीशियम हार्डनेस केवल 68 है।



क्या है चंबलः
 करीब 960 किलोमीटर तक अविरल धार वाली इस नदी का इतिहास कम वैभवशाली नहीं रहा है। इंदौर के पास विंध्य की पहाड़ियों में मऊ स्थान से निकलकर उत्तर से दक्षिण की ओर बहने वाली यह नदी राजस्थान, मध्यप्रदेश की सीमा में 960 किलोमीटर बहने के बाद इटावा के पास यमुना को जीवन देती है। इसका नाम चर्मावती होने के पीछे कथा है कि वैदिक काल में राजा रंतिदेव ने यहां अग्निहोत्र यज्ञ कर इतने जानवरों की बलि दी कि इस नदी के किनारे चमड़े से भर गए। इन कारण इस नदी का नाम चर्मणी हुआ। तमिल भाषाओं में चंबल का अर्थ मछली भी है। इस नदी में कैटफिश करोड़ों की संख्या में आज भी मिलती हैं। पांचाल राज्य की द्रोपदी ने भी इस नदी का पानी पिया और उसकी पहल पर ही राजा द्रुपद ने पहली बार इस नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने की पहल कर इसके किनारों को अपवित्र करने को निषेध कर दिया।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

चंबल के बीहड़ की जमीन वन विभाग को दिए जाने का विरोध

 चंबल पर बाजार के  नाखून गड़ने  लगे  हैं। इसका ताजा उदाहरण मुरैना के  बीहड़  हैं। यहां  से  किसानों को खदेड़ा  जा रहा  है। इसका विरोध  भी शुरू  हो गया  है। मुरैना - चंबल के बीहड़ में ग्राम अटार, मदनपुरा, देवलाल पुरा, खेरो, खिर कारी, डिगवार , रहूगांव, रेमजा का पुरा की लगभग 600 हैक्टेयर भूमि ,रक्षा मंत्रालय (डीआरडीओ )बधरेंटा के प्रोजेक्ट के एवज में वन विभाग को आवंटित की गई है। इस जमीन पर लगभग 1000 परिवार कई पीढ़ियों से काबिज होकर कास्त कर रहे हैं । उद्योग धंधे नहीं होने से उनकी आजीविका इसी भूमि से पैदा होने वाली फसल से चलती है। इस जमीन को वन विभाग को आवंटित किए जाने से उक्त सभी परिवार विस्थापित होकर भुखमरी के शिकार हो जाएंगे । इस संबंध में सैकड़ों महिला ,पुरुष, बच्चे इकट्ठे होकर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन प्रेषित करने आए । उन्होंने मुख्यमंत्री तथा कलेक्टर के नाम ज्ञापन प्रस्तुत कर वन विभाग के आवंटन को रद्द करने तथा वीहड की जमीन के पट्टे काबिज किसानों को देने की मांग की। उक्त मामले पर ज्ञापन स्थानीय अधिकारियों द्वारा लिया गया। परंतु बाद में कलेक्टर महोदय से प्रतिनिधि मंडल ने मुलाकात की । उन्होंने मामले की जांच कराने तथा स्थिति को देखते हुए कार्यवाही करने का आश्वासन दिया है। इस कार्यवाही का नेतृत्व मध्य प्रदेश किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष अशोक तिवारी, छात्र नेता राजवीर सिंह धाकड़ ,किसान सभा के जिला अध्यक्ष रामनिवास शर्मा ,किसान नेता श्री कृष्ण यादव ने किया। ज्ञापन देने वाले प्रतिनिधिमंडल में घमंडी केवट, भैरव लाल भूतपूर्व सरपंच, काशीराम केवट, रघुवीर केवट, राम चरण केवट, आदि शामिल रहे। किसान नेताओं ने आगामी कार्यक्रम के  लिए सबलगढ़ में 23 फरवरी को प्रदर्शन का ऐलान किया है।

शुक्रवार, 24 जून 2016

बीहड़ पर किताब लिखने के रुपरेखा मैने लगभग दस साल पहले तय की थी। मूर्खता में मैने अपने ब्लाग पर इसकी रुपरेखा भी डाल दी। अब देख रहा हूं जैसा कि एक महीने में मुझसे तीन लोग संपर्क कर चुके हैं सभी इस रुपरेखा पर ही किताब लिखने की तैयारी कर रहे हैं। मैं सोच रहा हूं क्यों न मैं अपना कार्यक्रम स्थगित ही कर दूं। भाई लोग हैं तो लिखने के लिए। किसी ने भी लिखा जानकारी तो लोगों तक पहुेच ही जाएंगी। मैं ही लिखूं ये जरूरी तो नहीं

बुधवार, 1 जून 2016

बीहड़: बीहड़ में शाह की साइकिल

बीहड़: बीहड़ में शाह की साइकिल

बीहड़ में शाह की साइकिल

बीहड़ को दिल में संजोए वह बस्ती से आया है। जिस जमीन से उसका कोई नाता नहीं उसे वह अपनी कर्मभूमि बनाना चाहता है। फकीरों की सादगी लेकिन नाम शाह आलम। चंबल और उसकी सहायक नदियों के कई किलोमीटर में फैले बीहड़़ी जीवन के लिए वह कुछ करना चाहते हैं। नेताओं सा करना नहीं, बल्कि ऐसा करना जिसका वह कोई वायदा नहीं करते हैं लेकिन जानते हैं कि स्वाभिमान की इस भूमि के बारे में ऐसा कोई लिखित दस्तावेजी साक्ष्य नहीं जिसे शोध में संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।
जामिया मिलिया से एमफिल बीहड़ के महत्व को समझते हैं और समझते हैं यहां के बांकेपन को। यही कारण है कि शाह की साइकिल इन दिनों बीहड़ की पगड़ंडियों पर दौड़ रही है। शाह इन दिनों बीहड़ की यात्रा पर है जिसकी शुरूआत उन्होंने 29 मई को औरैया से की। मातृदेवी संस्था के संस्थापक और आजादी की अलख जगाने वाले पंडित गेंदा लाल दीक्षित की मूर्ति पर औरैया में माल्यार्पण कर अभियान की शुरुआत की गई।
यह भी गजब बात है कि जिस पंडित गेंदालाल दीक्षित के नाम पर औरैया की जनता अपने को क्रांतिकारियों की भूमि का प्रतिनिधि कहती है उन दीक्षित जी की क्रांतिकारी संस्था मातृदेवी का शताब्दी वर्ष है यह याद दिलाने के लिए शाह आलम को बस्ती से आना पड़ता है।
आलम के दिमाग में बीहड़ को लेकर बहुत कुछ चल रहा है। इस मुद्दे पर मेरी उनसे विस्तार से बात हुई। शाह इसके लिए मुझसे मिलने विशेष तौर पर आए। दरअसल शाह जिन मुद्दों पर काम करना चाहते हैं उन मुद्दों पर पिछले एक दशक से में काम कर ही रहा हूं। अब मुझे शाह के तौर पर एक साथी मिल गया है। काम तेजी से बढ़ेगा एेसी उम्मीद है। ------

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

पूर्व दस्यू रेनू यादव का नया अवतार

चंबल-यमुना के बीहड़ में समय गुजारने वाली और कभी किसी की परवाह नहीं करने वालीं रेनू यादव अब गौरक्षा दल से जुड़ गई हैं। उन्हें इस दल में महिला प्रकोष्ठ का महासचिव बनाया गया है। वह कहती हैं कि अब वह गरीबों, वंचितों और अशिक्षितों की लड़ाई लड़ेंगी। रेनू तो यहां तक कहती हैं कि वह तो आईएएस बनना चाहती थीं, बदमाशों ने उन्हें डकैत बना दिया। 14 साल की आयु में उनका अपहरण कर लिया गया.

रविवार, 21 अप्रैल 2013

बीहड़ में फिर धूलिया

बीहड़ में फिर धूलिया
तिग्मांशु धूलिया एक बार फिर बीहड़ में उतर गए हैं। तिग्मांशु यानी वही पान सिहं तोमर वाले। राष्ट्रीय पुरस्कार से उत्हासित धूलिया बीहड़ की कथावस्तु लेकर एक और फिल्म बना रहे हैं। बुलेट राजा नाम की इस फिल्म की शूटिंग के लिए वह बीते दिन इटावा के चकरनगर इलाके में थे। बहुंत मन था तिग्मांशु से मिलने का, लेकिन व्यस्तता के कारण ऐसा नहीं हो सका। तिग्मांशु ने पहले पान सिंह तोमर और अब बुलेट राजा पर फिल्म बनाकर बीहड़ के दो कालखंडों को छू लिया। पानसिंह तोमर (1970-1990) के बीच में बीहड़ के मिजाज, वहां के हालात की कहानी है तो बुलेट राजा देश में खुली अर्थव्यवस्था आने के साथ फैले बाजारवाद के बाद बीहड़ में घुसते अपहरण उद्योंग के बाजार की कहानी है।  इस तरह मैने अपने अध्ययन में बीहड़ को जिन तीन कालखंडों बागी(1920-1950), डकैत (1950-1980), दस्यु या लुटेरे (1980-अब तक) में बांटा है उसमें तिग्मांशु अंतिम दो कालखंड को सिल्वर स्क्रीन पर उतार चुके हैं। मैरी हार्दिक इच्छा थी कि तिग्मांशु से मिलता और उनसे बागी सन्यासी पर फिल्म बनाने का सुझाव देता। मगर ऐसा हो नहीं सका। आगे फिर कभी मौका मिले....

मंगलवार, 19 मार्च 2013

पान सिंह के हिस्से सिर्फ पदक ही आए

बागी होने से दो साल पहले पान सिंह द्वारा गांव में बनवाया गया मंदिर।

आज भी ऐसी हैं भिडौसा गांव की गलियां

भिडौसा स्थित पान सिंह तोमर का घर

पान सिंह तोमर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की घर सुन गांव में इकट्ठे हुए लोग।

पान सिंह के बहाने बीहड़ एक बार फिर चर्चा में है। बाधा दौड़ के सात बार राष्ट्रीय चैंपियन रहे पान सिंह के जीवन पर बनी तिग्मांशू धूलिया की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’को इस बार सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फिल्म का पुरस्कार मिला है और इस फिल्म में पान सिंह की •ाूमिका नि•ााने वाले इरफान खान को सर्वश्रेष्ठ अ•िानेता चुना गया है। फौजी से डकैत बने इस शख्स की कहानी है ही इतनी स्तब्ध कर देने वाली। बीहड़ को न समझने वालों के लिए यह विस्मय से •ारा जीवन है तो बीहड़ वालों के लिए ‘बागी’ होने की सच्चाई। चंबल के बीहड़ जिन डकैतों के लिए मशहूर हैं उसी चंबल का इलाका अपने जाबाज फौजियों के लिए •ाी जाना जाता है। मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के क्वारी नदी के बीहड़ में बसे अति पिछड़े गांव •िाड़ौसा में जन्में पान सिंह का जीवन मनुष्य के आत्मसम्मान और उसके गौरव से जीने की कहानी है। फौज में •ार्ती होने से पहले पान सिंह की काबिलियत को न तो गांव वाले जानते थे और न स्वयं पानसिंह। 1950 और 1960 में बाधा दौड़ के चैंपियन बनने और 1958 में एशियन खेलों में हिस्से लेने तक •ाी उनकी ख्याति और कहानी ऐसी नहीं थी कि उस पर फिल्म बन सके। बीहड़ को •ाुनाने और उसे पर्दे पर उतारने वालों के लिए बीहड़ सदा से ही दिलचस्प विषय रहा है। मगर अगर पान सिंह डकैत न होते तो शायद ही राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सफलता या काबिलियत के कोई मायने होते।
हालांकि, पानसिंह जिन परिस्थितियों में डकैत बने वह बीहड़ के लिए कोई अनोखी बात नहीं थी। 70 के दशक तक इस इलाके में डकैत को ‘बागी’ कहने का ही चलन था। यानी वह शख्स जो व्यवस्था से परेशान होकर उसका विरोध करता है। इस दशक में बीहड़ में कई और नामी डकैत मलखान सिंह, मोहर सिंह, माखन सिंह, माधो सिंह •ाी थे और इनके डकैत बनने के पीछे •ाी कमोबेश वही कारण थे जिन्होंने पान सिंह को डकैत बनने के लिए मजबूर किया। पान सिंह को बागी कहें या डकैत इस परंपरा से अगर कोई चीज उन्हें अलग करती है तो वह है मनुष्यता के लिए उनका लगातार संघर्ष। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर उनकी वह उपलब्धियां जो शायद किसी अन्य डकैत में नहीं थी। हालांकि घनश्याम बाबा पान सिंह से कहीं अधिक पढ़े लिखे थे तो मान सिंह ने अधिक कष्ट उठाए थे। माखन और मलखान सिंह को पान सिंह से अधिक अपमानित होना पड़ा था और मुरैना इलाके में मशहूर डकैत घनश्याम अधिक चमत्कारिक। घनश्याम डकैत खड़े ऊंट पर बिना किसी के सहारे चढ़ जाते थे और उस समय जिन इलाकों में उन्होंने डकैती डाली वह जानते हैं कि वह क•ाी जमीन न पर चलकर मकान से मकान ही चलते थे। फुर्तीले इतने गजब के कि अगर उन्हें मौका मिला होता तो वह बांसकूद या ऊंची कूद के राष्ट्रीय चैंपियन तो अवश्य ही होते। पानसिंह ने डकैत बनने के बाद •ाी क•ाी कोई जघन्य कांड नहीं किया। यहां तक कि अपने •ातीजे बलवंत को •ाी उसने आठ गुर्जरों को मारने से रोका था।
डकैतों के जीवन पर पहली बार कोई फिल्म नहीं बनी है। इससे पहले पुतली बाई और मोहर सिंह-माधो सिंह के जीवन को लेकर •ाी फिल्म बनाई जा चुकी हैं, लेकिन जो शोहरत और सफलता पान सिंह तोमर की फिल्म को मिली वह दरअसल पानसिंह के जीवन और उनके संघर्ष की सफलता है। हां, बीहड़ पर फिल्म बनाकर •ाले ही तिग्मांशू धूलिया ने पानसिंह के जीवन को चर्चा में ला दिया हो लेकिन न तो इससे बीहड़ का कुछ •ाला होने वाला है और न ही पान सिंह के उस परिवार का जो आज •ाी बेहतर स्थिति में नहीं है। पान सिंह के पुत्र ने तो तिग्मांशू पर कुछ आरोप •ाी लगाए थे और उनकी विधवा पत्नी झांसी में सामान्य सा जीवन गुजारती है। पान सिंह का गांव •िाडौसा आज •ाी उतना ही उजड्ड और पिछड़ा हुआ है। आखिर पान सिंह और उसके गांव को ‘पदक’के सिवा मिला ही क्या है। हालांकि तिग्मांशू की यह फिल्म इस क्षेत्र के जीवन और उसकी कठिनाई को अधिक वास्तवित तौर पर पर्दे पर उतारने में सफल रही है। जैसा कि पत्रकारिता में शोध कार्य कर रहे और ग्वालियर के पत्रकार •ाुवनेश तोमर कहते हैं कि इस फिल्म ने पान सिंह के संघर्ष और इस इलाके की कठिनाई को नए तरीके से सबसे सामने रखा है। यह फिल्म इस इलाके की बदनामी करती हुई नहीं लगती बल्कि एक बार फिर सोचने को मजबूर कतकी है कि यहां हालात ऐसे क्यों हैं।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

दस्यु रमेश सिकरवार का सरेंडर


 दो किसानों की हत्या करने के बाद एक साल से फरार चल रहे पूर्व दस्यु रमेश सिकरवार ने मध्यप्रदेश के श्योपुर जिला कलक्टर के सामने समर्पण कर दिया है। अपने फरारी के दिन जंगल के अलावा भोपाल के गांधी आश्रम में भी बिताए। यहीं उसकी मुलाकात एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजगोपाल पीवी से हुई। राजगोपाल ने ही उसे सरेंडर करने का सुझाव दिया। उसके बाद सोमवार को रमेश ने श्योपुर एसपी डॉ. एमएस सिकरवार के सामने सरेंडर कर दिया। एक साल पूर्व दस्यु रमेश सिकरवार का जमीन को लेकर कैमारा गांव के किसान काशीराम और कल्ला रावत से झगड़ा हुआ था। विवाद से गुस्साए रमेश ने दोनों किसानों की गोली मारकर हत्या कर दी और फरार हो गया। कुछ महीने कराहल के जंगल में रहने के बाद रमेश राजस्थान व उत्तरप्रदेश में अपने रिश्ते-नातेदारों के यहां चला गया था। इधर-उधर भटकने से परेशान होकर करीब दस महीने पहले वह भोपाल पहुंचा और वहां गांधी आश्रम में रहने लगा। यहीं उसकी मुलाकात राजगोपाल पीवी और एकता परिषद के अन्य पदाधिकारियों से हुई। गांधी आश्रम में ही रमेश सिकरवार ने सरेंडर करने की बात श्री राजगोपाल के समक्ष रखी थी।

बुधवार, 26 सितंबर 2012

कृष्णा मिश्रा की नई फिल्म का टाइटल मेरे ब्लॉग से

' वुंडेड' फेम फिल्म निर्देशक कृष्णा मिश्रा अब नई फिल्म लेकर आ रहे हैं। निर्भय गुर्जर के जीवन पर बनी इस फिल्म का ' बीहड़ ' रखा गया है। यह तो मेरे ब्लॉग का नाम है। कृष्णा ने ऐसा क्यों किया है और क्या यह चोरी नहीं है। इस पर कानूनी सलाहकारों से मशविरा कर में अगला कदम उठाउंगा। यह फिल्म निर्भय सिंह गुज्जर की सच्ची कहानी पर  आधारित है और इस फिल्म में डाकू मान सिंह खुद अपनी भूमिका निभा रहे हैं. हाल ही में फिल्म के सिलसिले में  डाकू मान  सिंह दिल्ली आए और मीडिया से रुबरु हुऐ. फिल्म में फूलन देवी का किरदार निभा रही दीपिका शर्मा भी उनके साथ मौजूद  थीं.  इस फिल्म में कृष्णा ने बीहड़ के रियल मुद्दों को उठाया है, उम्मीद है कि दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ पाएगी।

फिल्म की कहानी डाकू मान सिंह के डाकू बनने पर आधारित है. कृष्णा मिश्रा से पूछने पर कि डाकू मान सिंह के लिए उन्होंने  मान सिंह से ही क्यों संपर्क किया, इस पर उनका जवाब था, मैं चाहता था कि कोई रियल किरदार ही डाकू मान सिंह की  भूमिका में दिखे. इसलिए मैंने सोचा कि डाकू मान सिंह से बेहतर विकल्प दूसरा कोई हो नहीं सकता. इसी विश्वास से साथ  जब मैंने उनसे संपर्क किया और फिल्म के बारे में बताया और साथ ही इच्छा जाहिर की कि वही इस फिल्म में काम करें तो  वह तुरंत तैयार हो गए. इससे अच्छी बात मेरे लिए और क्या हो सकती थी कि खुद डाकू मान सिंह अपना किरदार निभाएं.

शनिवार, 22 सितंबर 2012

बीहड़ में फिर से फरमान सुनाने की तैयारी ?

बीहड़ में डकैत रामवीर गुर्जर (फाइल फोटो)।
रेनू यादव


 





चम्बल के कटीले जंगलों से डर रही है रेनू यादव , मगर पूर्व डाकू रामवीर चाहता है की रेनू फिर से उठाये असलहा और कूदे बीहड़ में / 
डाकुओं को "इष्टदेव" के रूप में पूजने वाले नेताओं की इसमें कोई चाल तो नहीं ?

देश की दिशा और दशा तय करने वाले  "राजनेता " दिल्ली में बैठकर सरकार की उम्र के आकलन के 
साथ  लोक सभा चुनाव की तैयारी में लग गए हैं तो दिल्ली से सैकड़ों मील दूर चम्बल और पाठा के डाकू 
भी आगामी लोक सभा चुनाव में अपनी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उपस्थिति की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं 
/ उनको पता है की इस इलाके  में होने वाले चुनाव में उनकी थोड़ी सी भागीदारी उन्हें बड़ा इनाम दिला 
सकती है लिहाजा इस मौके को वह भुनाने की पूरी कोशिस में जुट गये हैं / चुनाव के दरम्यान कई बार 
इस इलाके के नेताओं के बीच "इष्टदेव" के रूप में पूजे जा चुके चम्बल और पाठा के डकैत अपनी नयी 
योजना की सफलता की तैयारी में उतनी ही सिद्दत के साथ लगे हैं जितना चुनाव लड़ने के लिए नेता / 
  चंबल के कुख्यात डकैत निर्भय गुर्जर , रज्जन गुर्जर , सलीम , और  और पाठा के   ददुआ, ठोकिया और 
रागिया की मौत के बाद कुछ समय के लिए चंबल और पाठा की  घाटी शांत हो गई थी, २०१२ में हुए 
यू.पी. अस्सेम्बली के चुनाव में डाकुओं के फरमान के बगैर जब चुनाव हुआ तो बीहड़ी इलाके की जनता 
ने भी बिना  किसी डर के दिल खोल कर मतदान क्या / लेकिन लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही डकैतों 
के कदमों की आहट फिर से सुनाई देने लगी है /.बीहड़ी सूत्रों के मुताबिक़  राजनीतिक आकाओं ने उन्हें 
फिर से बढ़ावा देना शुरू कर दिया है / .पाठा में  रागिया गिरोह की कमान संभालकर बलखंडिया पटेल ने
 आतंक का नया अध्याय शुरू कर दिया है / . डकैतों के रहमो-करम पर सांसद-विधायक बनने वाले 
सफेदपोशों ने भी बलखंडिया को ददुआ और ठोकिया की तरह 'ईष्ट' मान लिया है / जो जानकारी मिली है 
उसके मुताबिक़  पिछले माह चित्रकूट की अदालत में  पेशी के बाद   बांदा जाते समय पुलिस हिरासत से 
भागे 13 डकैत भी उसके गिरोह में शामिल हो गए हैं./  दूसरी तरफ, देश की आतंरिक और वाह्य सुरक्षा के
 लिए  कभी पंजाब में तैनात रहा सीआरपीएफ का सिपाही राम चन्द्र अब स्वयं अमन पसंद जनता के 
लिए ख़तरा बन गया है /  फौजी  रामचंद्र यादव भी चंबल में आ धमका है./  उसका गिरोह भी तेजी से 
अपना प्रभाव बढ़ाता जा रहा है./ सैकड़ों किलोमीटर की परिधि में फैले चम्बल के बीहड़ में रामचंद्र की 
चहल कदमी निर्द्वंद जारी है /  रामचंद्र ने बीहड़ में मारे जा चुके डाकुओं के गिरोह के बचे हुए डकैतों से 
संपर्क साधा और धीरे-धीरे उन्हें अपने साथ मिला लिया. आज उसके गैंग में 10-12 डकैत  हैं, जिनके 
पास अत्याधुनिक हथियार भी है./ इसके अलावा जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे अरविन्द 
गुर्जर के गिरोह ने बाहर खुली हवा में सांस ले रही पूर्व दस्यु सुंदरी रेनू यादव को एक बार फिर से चम्बल 
के बीहड़ों में भेजने और उसके गैंग के बचे डाकुओं की कमान सम्हालने की धमकी दे रहा है / रेनू यादव अपनी सुरक्षा की गुहार प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर कर चुकी है / रेनू का कहना है की चम्बल में डाकुओं के अंत की कहानी उसी के गिरोह से शुरू हुयी / ४ दिसंबर २००५ की रात उसे अच्छी तरह से याद है / औरैया जिले के मई गाँव के जंगलों में डाकू चन्दन यादव अपनी दस्यु सुंदरी रेनू यादव और गिरोह के अन्य सदस्यों के साथ आराम कर रहा था / तभी उस वक्त का सबसे खूंखार डाकू रामवीर गुर्जर अपने साथी डकैतों के साथ वहाँ आ धमका / दरअसल वह चाहता   था की  रेनू यादव चन्दन यादव  का साथ छोड़  कर उसकी  हमराह  बने  मगर  यह  ना  तो  चन्दन को पसंद  था और ना  ही  रेनू इससे सहमत  हुयी / रामवीर जानता  था की चन्दन के जीते  जी  वह  रेनू को नहीं  पा  सकता  / राम  वीर  ने  ६  घंटे  से अधिक  समय  तक  फायरिंग  कर चन्दन को मई के जंगलों में मार  गिराया  लेकिन  रेनू फिर भी  रामवीर  के गिरोह में शामिल नहीं हुयी / रेनू ने रामवीर की बन्दूक छीनकर उसको गोली मारकर लहूलुहान कर दिया और जंगल से भाग आई / रेनू के इस कदम से रामवीर गुर्जर बौखला गया और उसने अगले ही दिन चन्दन गिरोह के तीन अन्य सदस्यों को कैथौली के जंगलों में मारकर फेंक दिया / डाकुओं के बीच लगातार शुरू हुए गैंगवार का फायदा पुलिस ने उठाना शुरू किया / आखिर कार डाकुओं की दरिंदगी से परेशान बीहड़ की जनता पुलिस की सहायता के लिए आगे आई और चम्बल के ज्यादातर डाकू या तो पुलिस की गोलियों के शिकार हुए या फिर जान बचाने के लिए सरेंडर कर दिए / २०१२ में हुआ असेम्बली का चुनाव डाकुओं बगैर किसी फरमान के संपन्न हो गया / राज्य के अन्य हिस्सों की तरह यहाँ की जनता ने भी जागरूकता दिखाई और जमकर मतदान किया वह भी बिना किसी डर और भय के / यहाँ की जनता को लगा की डाकुओं का फरमान अब इतिहास बन चुका है और भविष्य उनका है जिसमे वह अपने पसंद का प्रतिनिधि चुनकर अपने इलाके के विकास की नयी इबारत लिखेंगे / लेकिन जेल में ऊम्र कैद की सजा काट रहे रामवीर गुर्जर द्वारा डाकू चन्दन की प्रेमिका और  दस्यु सुंदरी रही रेनू यादव को दुबारा बीहड़ में जागर बचे डाकुओं के गिरोह का लीडर बनने के हुक्म को सुनकर रेनू और  यहाँ की जनता एक बार फिर काँप उठी है / शांत हो चुके बीहड़ में यदि एक बार फिर से असलहे की गर्जना सुनाई डे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं / बीहड़ शांत रहे और वहाँ की जनता चैन की जिंदगी जी सके इसके लिए जरूरत है पुलिस के दमदार और प्रभावी पहल की लेकिन फिलहाल तो पुलिस के कदम कस्बों और शहर तक ही सीमित दिखाई डे रहे हैं / रेनू का कहना है की डकैतों का अंत उसी से शुरू हुआ लेकिन कहीं ऐसा ना हो की एक बार फिर डाकुओं की शुरुआत भी उसी से ना हो जाए / 
फिलहाल चंबल में बड़े डाकू तो नहीं हैं मगर जिस तरह से रामचंद्र गैंग की ताकत बढ़ी है, उसे देख कर 
यही कहा जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर डकैतों का फरमान आ सकता है /.
' अपहरण का दंश झेल चुके चंबल निवासी हरिशचंद्र तिवारी का कहना है, 'चंबल में डाकुओं का फरमान
 एक परंपरा है /. 2014 के संसदीय चुनाव मे भी इसी तरह का प्रभाव नजर आने की संभावनाओं से इंकार
 नहीं किया जा सकता/' फिलहाल, एसएसपी राजेश मोदक ने रामचंद्र पर 10 हजार रुपये का इनाम रख 
दिया है. एसओजी को भी सतर्क कर दिया गया है / 
दरअसल, इस इलाके में डाकू बहुत समय से नेताओं के काम आते रहे हैं/ पहले वे फरमान जारी करके 
नेताओं को जिताते हैं और फिर खुद या अपने रिश्तेदारों को सक्रिय राजनीति में ले आते हैं/ यही वजह है 
कि 2014 लोकसभा चुनाव में बलखंडिया और रामचंद्र यादव जैसे 'उभरते हुए' डकैतों की भूमिका न 
केवल चर्चा का विषय बनी हुई है बल्कि काफी हद असरदार भी साबित हो सकती है/ साफ संकेत मिल 
रहे हैं कि आने वाले लोकसभा चुनाव में डकैतों के फरमान का प्रभाव फिर से नजर आएगा/

फूलन की तरह संसद चाहती है दस्यु सुंदरी रेनू यादव

शिवपाल यादव से मिलने सैफई पहुंची रेनू यादव
एक समय चंबल घाटी की कुख्यात दस्यु सुंदरी रही फूलन देवी की तरह दूसरी दस्यु संुदरिया भी राजनीति मे आने के लिये इस समय लालयित नजर आ रही है। इसी कडी ताजा नाम जुडने जा रहा है रेनू यादव का । रेनू यादव चंबल घाटी मे एक समय मे अपने आतंक और खूबसूरती के कारण खासी चर्चा मे रही है। रेनू यादव समाजवादी पार्टी के जरिये राजनीति मे आने का सपना देख रही है। 
चंबल घाटी के डाकू रहे हो या फिर किसी दूसरे इलाके के डाकू सब पर राजनेताओ की मेहरबानी रही है और इसी मेहरबानी के नतीजे मे डाकुओ को खासी ताकत भी मिली रही है। कभी चंबल मे अपने आतंक और खूबसूरती का जलवा बिखेर चुकी दस्यु संदुरी रेनू यादव समाजवादी पार्टी के जरिये अब राजनीति उतरने का सपना देख रही है। 
उत्तर प्रदेश के कैबनिट मंत्री शिवपाल सिंह यादव से मिलने के लिये सैफई मे पहुॅची पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव को देखने के लिये सैफई मे लोगो का तॉता लग गया हर कोई उसकी एक झलक पाने को बेताव रहा। जींस पेन्ट ओर शर्ट पहने सैफई पहॅुची पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव ने सैफई मे  बातचीत मे कहा कि उसको दस्यु सुन्दरी वनाने वाली पुलिस है पुलिस मुझे बदमाशो के चंगुल से आजाद तो करा नही सकी उल्टा उसे दस्यु सुन्दरी बना दिया जब कि न्याय पालिका ने मुझे पूरी राहत दी और मेरे साथ न्याय किया। 
रेनू यादव का मानना है कि आज समाजवादी पार्टी की सरकार आने के बाद हर किसी को न्याय की आस बंधी है ऐसे मे उसे भी उम्मीद है कि उसके साथ जो अन्याय पुलिस की ओर से किया गया जरूर ही उसको भी न्याय मिलेगा। रेनू अपने साथ हुये अन्याय को लेकर उस समय के पुलिस अफसरो के खिलाफ कार्यवाही चाह रही है क्यो कि रेनू का मानना है कि उसके साथ पुलिस ने ना केवल अन्याय किया बल्कि उसको जान बूझ करके डाकू बनाने मे बडी भूमिका अदा की है। 
रेनू को आज भी वह घटना याद है जब 29 नबम्बर 2003 को स्कूल जाते समय दस्यु चन्दन यादव ने उसका अपहरण कर लिया गया था। जिसमे पुलिस की चौखट पर रेनू यादव के पिता विद्याराम यादव निवासी जमालीपुर थाना कोतवाली औरैया को न्याय नही मिला उनकी थाने मे कोई बात नहीं सुनी गयी। अपहरण के वाद फिरौती के लिये गैंग में रेनू प्रताडना व उत्पीड़न की शिकार होती रही। और गैंग द्वारा जो भी बारदात की जाती उसमें बतौर मुलजिम मेरा नाम भी शामिल कर दिया जाता था। पुलिस ने भी अपनी नाकामी छिपाने के लिए मुझे भी गैंग का सदस्य मानकर मुझे दस्यु सुन्दरी का खिताब दे डाला। 
रेनू यादव बताती है कि दस्यु गैंग में चार जून 2005 को दस्यु चन्दन यादव व दस्यु रामवीर गुर्जर की मुठभेड़ में चन्दन यादव के मारे जाने के बाद दस्यु रामवीर गुर्जर ने मुझे व गैंग को बन्धक बनाकर मुझे अपनी बदनियती का शिकार बनाने की कोशिश की तो मैने दस्यु रामवीर गुर्जर की ही बन्दूक से अपनी इज्जत आवरू की रक्षा हेतु गोली मार दी और मौका पाकर मै वहॉ से भाग निकली। तो इस पर बौखलाहट में रामवीर गुर्जर ने हमारी गैंग के तीन सदस्यों को लाइन में खड़ा कर हत्या कर दी थी। सात दिन तक मैं बीहड़ में भटकने के बाद अपने गांव जमालीपुर आ गयी। और गांव में रहने लगी तो तत्कालीन एस0 एस0 पी0 दलजीत सिंह चौधरी इटावा ने कोतवाली प्रभारी व एस0 ओ0 जी0 प्रभारी ने रेनू के गांव जाकर रेनू को थाना सिविल लाइन लाकर 14 फरवरी को मुझे फर्जी तरीके से जेल भेज दिया। तब से मैं जेल में रहकर अपनी बेगुनाही सावित करने के लिए विभिन्न जनपद न्यायालयों के चक्कर लगाती रही तथा कही जेलों में रही। रेनू यादव ने माना कि हर इन्सान को भगवान व न्याय पालिका पर पूरा भरोसा करना चाहिए कही न्यायलयों ने तो पुलिस को कड़ी फटकार लगाकर मेरे अपहरण व वरामदगी पर फटकार लगायी और ससम्मान दोषमुक्त किया। 29 मई 2012 को सात वर्ष तीन माह 15 दिन की अदालती कार्यवाही झेलने के बाद मै नारी बन्दी निकेतन लखनऊ से रिहा की गयी। पूर्व दस्यु सुन्दरी रेनू यादव ने कहा कि मै अपनी वाकी बची जिन्दगी को गरीबों पीड़ितों की सेवा में लगाना चाहती हूॅ। 
इटावा और औरैया पुलिस के रिकार्ड के अनुसार रेनू यादव का नाम डाकू सूची मे दर्ज है। रेनू यादव के खिलाफ दोनो जिलो मे करीब 15 अपराधिक मामले दर्ज है। जिनमे पुलिस मुठभेड के साथ आगजनी,हत्या के प्रयास के अलावा लूट जैसे वारदातो को अंजाम देने जैसे मामले है। रेनू यादव वैसे तो अपनी अपराधिक वारदातो से बीहडो मे भले ही चर्चा मे बनी रही हो लेकिन उसे देखा गया था पहली बार जब इटावा की सिविल लाइन पुलिस ने इटावा रेलवे स्टेशन के पास से एसएलआर के साथ गिरफतारी की गई। 
चंबल घाटी के इतिहास मे फूलन देवी की तर्ज पर कई महिला डकैत राजनीति मे आ चुकी है इससे पहले सीमा परिहार भी शिवसेना,इंडियन जस्टिस पार्टी मे होते हुये समाजवादी पार्टी मे आ चुकी है लेकिन इस समय सीमा परिहार ने खुद को राजनीति से खुद को दूर कर रहा है क्यो कि वुंडेड फिल्म के जरिये सीमा की जो कहानी आम लोगो की बीच आई उससे वो खुद काफी लोकप्रिय हो गई है। बिगबॉस मे तो पिछले दिनो दर्शक सीमा परिहार को देख ही चुकी बिगबॉस से सीमा परिहार को खास आर्थिक लाभ तो हुआ ही है साथ ही सीमा परिहार को कई हिंदी और भोजपुरी फिल्मो मे भी काम मिल चुका है अब ऐसे ही जाहिर है चंबल मे कभी आंतक मचा चुकी दूसरी दस्युसुंदरिया भी अपने आप को स्थापित करने के लिये राजनीति का सहारा लेने मे जुट गई। सीमा परिहार की चंबल घाटी की पहली ऐसी दस्यु सुंदरी रही है जो डाकू रहने के दौरान 
ही मां बन गई हो इससे पहले ऐसा कोई दूसरा उदाहरण चंबल ना तो देखने को मिला था ही सुनने को मिला था इसके बाद आया नंबर सलीम गैंग की सुरेखा नाम की महिला डाकू का जिसने बेटे को जन्म दिया सुरेखा को उम्रकैद की सजा हो चुकी है। मूल रूप से मध्यप्रदेश भिंड की रहने वाली सुरेखा इस समय भिंड जेल मे उम्रकैद की सजा काट रही है। रेनू यादव चंबल घाटी की तीसरी ऐसी महिला मानी जा रही है जिसने मां बनने का सौभाग्य हासिल किया है। 
समाजवादी पार्टी के जरिये राजनीति मे उतरने का सपना देख रही रेनू यादव एक बेटी की मां है रेनू यादव जिस समय चंदन यादव गैंग मे हुआ करती थी उसी समय उसने एक बेटी को जन्म दिया था जो आज रेनू की मां के पास जमालीपुर गांव मे रह रही है करीब आठ साल की हो चुकी रेनू की बेटी अब स्कूल मे पढने के लिये जाने लगी है।

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

बेहमई कांड: 30 साल में नहीं हो सकी गवाही

12 सितंबर को फिर बेहमई कांड की कानपुर देहात के एडीजे कोर्ट में सुनवाई है। 80 के दशक में देश को हिला देने वाले बेहमई हत्याकांड को 30 साल गुजर जाने के बाद भी इस मामले में आज तक गवाही नहीं हो सकी है। इत दौरान मामले के सभी मुख्य आरोपियों की मौत हो चुकी है। मामले में चार आरोरियों के खिलाफ नामजद और 36 अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। इनमें से अब केवल सात ही जिंदा हैं।
चंबल और यमुना के बीहड़ों में 80 के दशक में डकैत गैंगों की आपसी दुशमनी को यहां के निरीह ग्रामीणों को भोगना पड़ा। फूलन देवी के गैंग ने बेहमई में 14 फरवरी 1981 को शाम ढले हमलाकर ठाकुर जाति के 21 ग्रामीणों को मार दिया था। फूलन की निगाह में बेहमई गांव उसके विरोधी डाकू  लालाराम श्रीराम गिरोह की शरणस्थली था और इसी गांव के एक स्थान पर डाकू  लालाराम ने फूलन देवी की इज्जत लूटी थी। इस घटना की प्रतिक्रिया में गुस्साए श्रीराम-लालाराम के गैंग ने 26 मई 1984 को औरैया जिले के मई-अस्ता गांव में 13 मल्लाह जाति के लोगों को मार दिया था।
बेहमई मामले की रिपोर्ट कानपुर देहात में दर्ज की गई। इस मामले में फूलनदेवी, रामअवतार, मुस्तकीम और लल्लू को नामजद कराते हुए 36 अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया। तब से लेकर अब तक इस मामले में पीड़ित न्याय की बाट देख रहे हैं। जवानी में जो विधवा हुईं वह बुढ़ा गई हैं। जो बच्चे थे वह जवान हो गए हैं लेकिन अभी तक इस मामले में गवाही तक नहीं की जा सकी है। इस मामले की सुनवाई कानपुर देहात के एडीजे कोर्ट सात में चल रही है। आरोपी पक्ष के वकील गिरीश नारायण द्विवेदी बताते हैं कि इन 30 सालों में इस मामले में 460 से अधिक तारीखें लग चुकी हैं। बीते दो-ढाई साल से तो हर तारीख में आरोपियों को हाजिर करने के लिए पुलिस को नोटिस जारी किए जा रहे हैं लेकिन आरोपियों को उपस्थित नहीं किया जा सका है। उन्होंने बताया कि इस मामले में सभी चारों मुख्य आरोपियों की मौत हो चुकी है। कुल 40 लोगों में अभी सात लोग ही जिंदा बचे हैं। इनमें एक आरोपी रामसिंह जेल में है। तीन आरोपी भीखा, विश्वनाथ उर्फ पुतानी उर्फ कृष्णस्वरूप और फोसे उर्फ फोसा जमानत पर हैं। तीन आरोपी श्यामू और दो अन्य ऐसे हैं जिन्हें अदालत में हाजिर करने के लिए न्यायालय से बार-बार नोटिस दिए जा रहे हैं लेकिन पुलिस उन्हें हाजिर नहीं कर सकी है।
इस मामले में पीड़ितों के पैरोकार राजाराम का कहना है कि वह वर्षों से मामले में न्याय की उम्मीद लगाए हुए कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। इसके लिए वह सब कुछ भूलकर केस लड़ रहे हैं। मगर पिछले महीने तक तो इस मामले में आरोप तक तय नहीं किए जा सके। अदालत ने 24 अगस्त 2012 को मामले में आरोप तय किया। अब आज बुधवार 12 सितंबर को मामले में गवाही होनी है लेकिन नहीं लगता कि इस दिन गवाही हो पाएगी। वकील गिरीश नारायण का कहना है कि कानपुर कोर्ट में स्ट्राइक हो सकती है।

‘‘इस मामले में देरी का कारण यह रहा कि कभी भी आरोपियों को एक साथ न्यायालय में हाजिर नहीं किया जा सका।’’
गिरीश नारायण द्विवेदी, मामले में वकील

सोमवार, 10 सितंबर 2012

बेहमई का अर्जुन

रामकरन का बेहमई गांव स्थित घर।
rastrapati se arjun award leta ramkaran

















यूपी का बीहड़ी गांव बेहमई 31 साल बाद फिर सुर्खियों में है। डकैत फूलनदेवी की करतूत से विश्वपटल पर पहली बार आए इस गांव की कालिमा को गांव के सपूत के कारनामे ने धो डाला है। यहां के रामकरन सिंह को एथलीट के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अजुर्न अवार्ड से पुरस्कृत किया गया है। रामकरन की उपलब्धि इस मायने में बेमिसाल है कि भूख और गरीबी के साथ वह जिंदगी भर एक कालिमा से भी लड़ा है। रामकरन आंखों की रोशनी गवां चुका है।
कानपुर देहात जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम दिशा में राजपुर थाना क्षेत्र का ठेठ बीहड़ी गांव है बेहमई। घनघोर गरीबी, अशिक्षा और दहशत यहां की नीयत है। 14 फरवरी 1981 को इसी गांव में फूलनदेवी ने 22 ठाकुरों को गोलियों से भून दिया था। 1990 में इस गांव के वीरेंद्र सिंह और कृष्णा सिंह के यहां रामकरन ने जन्म लिया तब बेहमई कांड को नौ साल हो गए थे। डकैतों की क्रूरता में जीते इस गांव का भविष्य अंधेरे में था। मगर एक अंधेरा और था जो रामकरन की राह में उसका इंतजार कर रहा था। मात्र चार साल की उम्र में एक हादसे ने रामकरन के जीवन में अंधेरा फैला दिया। 1994 की एक सुबह दीपावली के आसपास एक पटाखा चलाते समय रामकरन की आंखों की रोशनी सदा के लिए चली गई। अब इस कालिमा से ही उसे जिंदगी भर जूझना था। इस हादसे में रामकरन का भाई रामनरेश भी घायल हो गया। रामकरन रोजमर्रा के साधारण काम के लिए भी दूसरों पर निर्भर था, मगर अंदर वह इस साधारणता को असाधारण में बदलने को जूझ रहा था। इस हालत में भी वह भाई के साथ गांव के स्कूल जाता रहा। दो साल बाद उसने दिल्ली के अंध विद्यालय में जाने की जिद पकड़ ली। किसी तरह दो जून रोटी खाने वाले परिवार के लिए यह पहाड़ खोदना था, मगर रामकरन के परिवार ने हार नहीं मानी। महज आठ वर्ष की उम्र में वह दिल्ली के किंगसेव कैंप अंधविद्यालय में प्रवेश को जूझ रहा था। इस विद्यालय में प्रवेश पाने में ही उसे दो साल लग गए। मगर उसने दिल्ली का दामन नहीं छोड़ा। 2006 का साल रामकरन के जीवन में सबेरा लेकर आया। उसने द्लिी की क्रॉस कंट्री साल्वन मैराथन में भाग लेने का फैसला किया। इस मैराथन में वह प्रथम आया। यहीं से उसने एथलीट बनने की ठानी। वह भी अकेले अपने दम पर। 2006 से 2009 तक वह तीन बार पैराएथलीट आयोजन में नेशनल चैंपियन चुना गया। इसके बाद यूएसए  में 2009 में हुए यूथ चैंपियनशिप के लिए वह चयनित हुए लेकिन उसमें खेल नहीं सके। 2010 में चीन में होने वाले एशियन गेम्स में सिल्वर मैडल हासिल किया और 2011में तुर्की में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में 10 और 5 किलोमीटर दौड़ में दो कांस्य हासिल किए। 2012 में पैराओलंपिक क्वालीफाईंग के लिए मलेशिया में हुई चैंपियनशिप में उनके हिस्से में दो गोल्ड आए। उन्हें यहां नया एशियन रिकार्ड भी बनाया। 800 मीटर की दूरी उन्होंने रिकार्ड 2.3 मिनट में पूरी की। मगर इस बार भी वह आईसीसी लाइसेंस न मिल पाने के कारण पैराओलंपिक में भाग नहीं ले सके। मगर उनके प्रदर्शन को देखते हुए रामकरन को अर्जुन अवार्ड से पुरस्कृत किया गया है।
रामकरन सिंह ने कल्पतरु को बताया कि वह रोज सुबह-शाम दो-दो घंटे अभ्यास करते हैं। वह सामान्य लोगों के साथ अभ्यास में भाग लेते हैं। वह अफसोस के साथ कहते हैं कि सरकार से उन्हें कोई सुविधा कभी नहीं मिली। वह आज भी अभ्यास के लिए 18 किलोमीटर दूर नेहरु स्टेडियम दिल्ली परिवहन की बसों से जाना पड़ता है। अपनी उपलब्धि से खुश रामकरन कहते हैं कि उनके माता-पिता इससे खुश हैं लेकिन अशिक्षा के कारण वह समझ ही नहीं पा रहे कि उनके बेटे ने क्या हासिल किया है। रामकरन का गांव आज उनकी इस उपलब्धि से फूला नहीं समाता। उनके पिता कहते हैं कि रामकरन की उपलब्धि इसलिए और बड़ी है कि वह जिंदगी भर मुसीबत और गरीबी से जूझा है। रामकरन की छोटी बहन आसमा इस उपलब्धि से बेहद खुश है। रामकरन पैराओलंपिक में पदक पाने के साथ एक अच्छी नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे हैं ताकि गरीबी और अशिक्षा में जी रहे उनके घर की दशा और दिशा दोनों बदल सकें।

सफलता का सफर
2006- दिल्ली की साल्वन मैराथन का विजेता
2006-09- तीन बार पैरानेशनल चैंपियनशिप जीती
2009- यूएसए में होने वाली यूथ चैंपियनशिप के लिए चयनित
2010 चीन में एशियन गेम्स में सिल्वर मैडल
2011में तुर्की में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में 10 और 5 किलोमीटर दौड़ में दो कांस्य।
 2012 पैराओलंपिक क्वालीफाईंग के लिए मलेशिया में हुई चैंपियनशिप में दो गोल्ड।
800 मीटर दौड़ में 2.3 मिनट लेकर एशियन रिकार्ड अपने नाम किया।

रामकरन से दो टूक बात

अफसोस की राज्य सरकार ने कुछ नहीं किया
आगरा। अपने दम पर उपलब्धि की इबारत लिखने वाले रामकरन सिंह को अफसोस है कि जिस राज्य के लिए उसने यह सब किया उसने उसकी उपलब्धि पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है। वह प्रदेश के मुखिया अखिलेश यादव को तेजतर्रार तो मानता है लेकिन उसे पता नहीं कि उनसे मुलाकात कैसे की जा सके। इसके साथ ही वह अपने बीहड़ी गांव की हालात और 31 साल पहले हुए अन्याय को लेकर भी व्यथित है लेकिन उसका लक्ष्य साफ है। पैराओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना। उनसे हुई बातचीत।
- अपनी उपलब्धि के लिए किसे धन्यवाद देते हैं।
- अपने माता-पिता और बड़े भाई को, जिन्होंने कभी भी उसका साथ नहीं छोड़ा। खुद आधी रोटी खाकर मुझे दिल्ली में रहने की व्यवस्था की। साथ ही कोच सतपाल सिंह और हॉस्टल फॉर कॉलेज गोइंग ब्लाइंड स्कूल किंगसेव कैंप, तिलक नगर दिल्ली के उन साथियों को जिन्होंने हमेशा हौंसला बढ़ाया।
- और सरकार के बारे में।
- केंद्र और राज्य सरकार से उन्हें कभी कोई सहायता नहीं मिली। यहां तक कि पहली मैराथन और तीन बार नेशनल चैंपियनशिप जीतने के बाद भी किसी ने नहीं पूछा। बस यह अर्जुन अवार्ड मिला है।
- कभी किसी से सहायता मांगी।
- हमारा परिवार गरीबी रेखा में आता है। शुरू में खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने तक के पैसे नहीं होते थे। ऐसे में हमने अपने क्षेत्र के विधायक (शायद उनका नाम मिथलेश था) से संपर्क किया अपनी समस्या रखी, मगर कोई मदद नहीं मिल सकी। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के पीए से फोन पर बात की, मेल भी भेजी मगर किसी ने मिलने तक का समय नहीं दिया। ऐसे में भला हम कर भी क्या सकते थे।
- अपने गांव बेहमई के लोगों के लिए कोई संदेश।
अपने दुर्भाग्य को मेहनत से ही बदला जा सकता है, मैं गांव वालों से बस यही कह सकता हूं। मेरे गांव में आज तक बिजली नहीं पहुंची, संपर्क मार्ग ठीक नहीं है। स्कूल भी ठीक नहीं बना। अगर में कुछ कर सका तो गांव में स्कूल और बिजली के लिए सरकार से पैरवी करूंगा। साथ ही चाहूंगा कि हमारे गांव की लड़कियां खूब पढ़ें।

आगे क्या करने का विचार है।
- मेरा सपना देश के लिए पैराओलंपिक में स्वर्ण लाने का है। इसके लिए मैं जमकर मेहनत कर रहा हूं। रोज सुबह चार बजे जागता हूं और हॉस्टल से 18 किलोमीटर दूर नेहरू स्टेडियम जाता हूं। यहां सामान्य लोगों के साथ दो घंटे तक नियमित अभ्यास करता हूं। शाम को भी दो घंटे मेहनत करता हूं। अफसोस यह है कि आज भी मुझे इसके लिए कोई सहायता नहीं मिल रही मगर मेरा लक्ष्य साफ है।


दुर्भाग्य से हर बार जंग
रामकरन के दुर्भाग्य ने उसे हर बार छला। मगर वह हार मानने वाला जीव नहीं। बचपन के दुर्भाग्य से लड़कर जब ट्रैक की राह पकड़ी तो पहली बार यही दुर्भाग्य फिर सामने आया। 2009 में यूएसए में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए रामकरन चयनित हो गए। मगर जब जाने की बारी आई तो पैर में फ्रेक्चर हो गया। 2012 में पैराओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया लेकिन प्रबंधन की लापरवाही कि आईसीसी लाइसेंस ही नहीं बन पाया, नतीजा वह फिर जाने से रह गए। रामकरन के पिता वीरेंद्र कहते हैं कि बड़ी मुश्किल से उसे पाला है। छुटपन से ही घर से दूर भेजना पड़ा और फिर खुद भूखे रहे। रामकरन की जिंदगी बन जाए इसके लिए पूरा परिवार दुर्भाग्य से लड़ता रहा।
भाई रामनरेश बताते हैं कि जब पहली बार रामकरन को छोड़ने दिल्ली गए तो उनकी आंखों में आंसू भर आए मगर करन अपनी धुन का पक्का निकला। उसने दिल्ली में ही रहने की ठानी। जाति प्रमाणपत्र न होने से किंगसेव कैंप अंध स्कूल में प्रवेश नहीं मिल पाया। ऐसे में लाजपत नगर स्थित प्राइवेट अंधविद्यालय में ही प्रवेश लेना पड़ा। दो साल बाद किंगसेव कैंप में प्रवेश का मौका मिला।
बेहमई गांव में रामकरन का परिवार।