मंगलवार, 10 जून 2008
पुलिस ने पंजाब को घेरा
एक लाख के ईनामी डाकू और भिंड,ग्वालियर, शिवपुरी के साथ मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश की पुलिस के लिए सिरदर्द बन चुके डाकू पंजाब को ग्वालियर के पास घाटीगांव में पुलिस ने घेर लिया है। सूचना लिखे जाने तक मुठभेड़ जारी है। मुठभेड़ में पंजाब के खास साथी राजेंद्र के घायल होने की सूचना है। मुठभेड़ की खबर सुनकर भारी भीड़ जमा हो गई है।जगजीवन परिहार और गड़रिया गिरोह के खत्म होने के बाद बीहड़ में पंजाब ही एक मात्र ताकतवर गैंग बचा हुआ है। यह खुशी की बात है कि बीते कुछ सालों से पुलिस डकैतों के खिलाफ काफी आक्रामक हुई है। वह डाकुओं को सीधे मुठभेड़ में मार गिरा रही है। अलबत्ता को किसी डाकू को मार गिराने के बाद अक्सर ही बीहड़ों में उसे धोखे से मार गिराने की कई कहानियां चल पड़ती हैं। मानों पुलिस ने किसी बहादुर के साथ बड़ी नाइंसाफी की हो।पंजाब का आतंक इस इलाके में बहुत है। वह गुर्जर डाकुओं की कड़ी में खतरनाक डाकू माना जाता है। अगर वह मारा गया तो यह इलाके की जनता के लिए राहत की बात होगी।
रविवार, 8 जून 2008
राजेंद्र और कमल गुजर्र
आगरा और धोलपुर के आसपास हंगामा मचा रहे बदमाश राजेंद्र और कमल गुर्जर पर डीजीपी उत्तरप्रदेश विक्रम सिंह ने 20 हजार का ईनाम घोषित किया है। साथ ही उन्होंने ऐलान किया है कि इन बदमाशों को मारो और मनपसंद पोस्टिंग और प्रमोशन पाओ। देखते हैं पुलिस का कौन बहादुर सामने आता है। डीजीपी महोदय कोई जुगत भिड़ाओ ऐसे तो यह हाथ आने वाले नहीं।
शुक्रवार, 6 जून 2008
जनप्रिय बागी
अपनी तमाम ऊंचनीच के बावजूद इस दौर के बागी जनप्रिय थे। अंग्रेजी कुशासन कुशासन और अव्यवस्था के खिलाफ लक्ष्यहीन और बहुत हद तक निजी ही सही उनकी बगावत बहुसंख्यक उत्पीड़ित जनता की प्रतिध्वनि ही थी। बागी मानसिंह के समाकालीन मुरैना जिले की पोरसा तहसील के गांव नगला के लाखनसिंह की लोकप्रियता तो इतनी अधिक फैल गई थी कि लोगों ने उन पर लंगुरिया (लोकगीत) तक बना लिए थे। जैसे-
नगरा के लाखनसिंह लगुंरिया।
तखत हिलाए दओ दिल्ली को।
अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें।
http://beehad.blogspot.com
नगरा के लाखनसिंह लगुंरिया।
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सोमवार, 28 अप्रैल 2008
दस्यु सुंदरी कौमेश
दस्यु सुंदरी कौमेश
चंबल के बीहड़ में एक नई महिला डकैत। इसके खौफ से परेशान है मध्यप्रदेश और राजस्थान की पुलिस। ऐसी दिलेर की भरे कसबे में दिन दहाड़े गोलियों की बौछार कर दी। कौन है यह। कहां रहती है। जानिए......
कई दशक पूर्व चंबल के बीहड़ में दस्यु सुंदरी फूलन देवी के खौफ ने आम आदमी के साथ पुलिस को परेशान कर रखा था। अब चंबल के बीहड़ में एक और दस्यु सुंदरी ने बंदूक उठाई है। बीहड़ में फूलन की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली इस दस्यु सुंदरी का नाम है कौमेश। जनपद पुलिस के रिकार्ड के मुताबिक जनपद के बसई डांग थाना क्षेत्र के गांव गोठियापुर निवासी छीतरिया की पुत्री कौमेश गुर्जर इन दिनों जगन गुर्जर गिरोह की सक्रिय सदस्य है। जनपद के बाडी कसबे में अंधाधुंध फायरिंग करने वाली कौमेश ने अपनी दिलेरी का परिचय दिया था। कौमेश के सिर पर मध्यप्रदेश पुलिस की ओर से चार हजार का ईनाम है। धौलपुर पुलिस ने उस पर पांच सौ रूपये का ईनाम घोषित किया है। अपराध बढ़ते देख पुलिस इनाम राशिर और बढ़ाने की तैयारी में है।
चंबल के बीहड़ में एक नई महिला डकैत। इसके खौफ से परेशान है मध्यप्रदेश और राजस्थान की पुलिस। ऐसी दिलेर की भरे कसबे में दिन दहाड़े गोलियों की बौछार कर दी। कौन है यह। कहां रहती है। जानिए......
कई दशक पूर्व चंबल के बीहड़ में दस्यु सुंदरी फूलन देवी के खौफ ने आम आदमी के साथ पुलिस को परेशान कर रखा था। अब चंबल के बीहड़ में एक और दस्यु सुंदरी ने बंदूक उठाई है। बीहड़ में फूलन की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली इस दस्यु सुंदरी का नाम है कौमेश। जनपद पुलिस के रिकार्ड के मुताबिक जनपद के बसई डांग थाना क्षेत्र के गांव गोठियापुर निवासी छीतरिया की पुत्री कौमेश गुर्जर इन दिनों जगन गुर्जर गिरोह की सक्रिय सदस्य है। जनपद के बाडी कसबे में अंधाधुंध फायरिंग करने वाली कौमेश ने अपनी दिलेरी का परिचय दिया था। कौमेश के सिर पर मध्यप्रदेश पुलिस की ओर से चार हजार का ईनाम है। धौलपुर पुलिस ने उस पर पांच सौ रूपये का ईनाम घोषित किया है। अपराध बढ़ते देख पुलिस इनाम राशिर और बढ़ाने की तैयारी में है।
शुक्रवार, 25 अप्रैल 2008
मोहर सिंह का अंत
एक और बेहमई को अंजाम देने की धमकी देने वाले मोहर सिंह मल्लाह का पुलिस ने अंत कर दिया। मोहर सिंह उन डकैतों की कड़ी में था जो राजनीतिक कारणों से बीहड़ों में कूदे। यमुना का बीहड़ मल्लाह डकैतों के लिए चर्चित रहा है। मोहर सिंह का बीहड़ी जीवन कुल जमा एक साल रहा। यूं वह मान सिंह मल्लाह और अरविंद गुजर्र गैंग में भी काम करता रहा। हाल ही में बीडीसी चुनाव हारने के बाद वह बीहड़ में कूद गया। इसके बाद उसने एक और बेहमई जैसे कांड को करने की धमकी दी थी।
गुरुवार, 10 अप्रैल 2008
तो शुरू करें
चंबल के बीहड़ों का अपराध जगत में अपना एक इतिहास है। चंबल और उसकी सहायक नदियों से बने लगभग 6 लाख एकड़ भूमि पर पसरे खौफनाक बीहड़ अपराधियों की शरणस्थली रहे हैं। इलाके में प्रचलित बागी,दस्यू या डकैत और लूटेरे जैसे शब्द एक प्रतीक हैं-अपराध की दुनिया के आए ह्रास का। ये शब्द ही नहीं अपराधी मानसिकता का जीता जागता दस्तावेज हैं।
क्षेत्र में प्रचलित सबसे पुराना अपराधी संबोधन बागी अंग्रेजी शासनकाल में प्रचलित था। यह वह समय था जब अंग्रेजी शासन में जमींदारों के जुल्मोसितम से तंग होकर लोग व्यक्तिगत तौर पर बगावत कर चंबल की गोद में चले जाते थे। तब वह इनकी मांग थी। हर मुसीबत में रक्षा करने वाली। बीहड़ बागी के लिए मां का आंचल। इन लोगों ने ही पहली बार इस जमीन पर गोलियों की आवाज गुंजित की थी। ये लोग भले ही व्यक्तिगत आघातों के चलते बीहड़ में कूदे हों लेकिन दिलों में अंग्रेजी शासन और जमींदारों के खिलाफ विक्षोभ तो था ही। इस समय लोगों ने उनके इस काम को नाम दिया बगावत। प्रचलित दमन की व्यवस्था से हटकर खड़े होने का कदम और इस तरह बन गए वह बागी। इस वर्ग में बागी सन्यासी,बह्मचारी, पंडित गेंदा लाल दीक्षित।
इन बागियों से क्षेत्र की जनता को कभी कोई बड़ी असुविधा नहीं हुई। यह ग्रामीणों से संपर्क भी कम रखते थे। डकैती डालते थे तो केवल सरकारी खजाने या जमींदार को ही लूटते थे। मगर जनता से संबंध नहीं। इनमें से कई डकैत तो सीधे-सीधे आजादी के लिए लड़े भी, हालांकि आजादी का कुल जमा उनका कंसेप्ट अंग्रेजों को देश से निकाल भर देना था। गांव वालों के संपर्क में न रहने से इनमें के कइयों को ग्रामीणों से ही मुठभेड़ हुई फिर या तो वह पकड़े गए या मार डाले गए। ब्रह्मचारी और गेंदालाल दीक्षित के दल की भी ग्रामीणों से भिडंत हुई थी। इसमें से उनमें 35 साथी मारे गए थे। इस मुठभेड़ में गेंदालाल और ब्रह्मचारी पुलिस के हत्थे चढ़ गए। यह लोग इस समय ग्वालियर में एक जगह डकैती डालने जा रहे थे। तो इस तरह बागी बने। अब इस बारे में और जानकारी के लिए बागी लिंक पर मिलेंगी जानकारी। इंतजार कीजिए........नमस्कार।
क्षेत्र में प्रचलित सबसे पुराना अपराधी संबोधन बागी अंग्रेजी शासनकाल में प्रचलित था। यह वह समय था जब अंग्रेजी शासन में जमींदारों के जुल्मोसितम से तंग होकर लोग व्यक्तिगत तौर पर बगावत कर चंबल की गोद में चले जाते थे। तब वह इनकी मांग थी। हर मुसीबत में रक्षा करने वाली। बीहड़ बागी के लिए मां का आंचल। इन लोगों ने ही पहली बार इस जमीन पर गोलियों की आवाज गुंजित की थी। ये लोग भले ही व्यक्तिगत आघातों के चलते बीहड़ में कूदे हों लेकिन दिलों में अंग्रेजी शासन और जमींदारों के खिलाफ विक्षोभ तो था ही। इस समय लोगों ने उनके इस काम को नाम दिया बगावत। प्रचलित दमन की व्यवस्था से हटकर खड़े होने का कदम और इस तरह बन गए वह बागी। इस वर्ग में बागी सन्यासी,बह्मचारी, पंडित गेंदा लाल दीक्षित।
इन बागियों से क्षेत्र की जनता को कभी कोई बड़ी असुविधा नहीं हुई। यह ग्रामीणों से संपर्क भी कम रखते थे। डकैती डालते थे तो केवल सरकारी खजाने या जमींदार को ही लूटते थे। मगर जनता से संबंध नहीं। इनमें से कई डकैत तो सीधे-सीधे आजादी के लिए लड़े भी, हालांकि आजादी का कुल जमा उनका कंसेप्ट अंग्रेजों को देश से निकाल भर देना था। गांव वालों के संपर्क में न रहने से इनमें के कइयों को ग्रामीणों से ही मुठभेड़ हुई फिर या तो वह पकड़े गए या मार डाले गए। ब्रह्मचारी और गेंदालाल दीक्षित के दल की भी ग्रामीणों से भिडंत हुई थी। इसमें से उनमें 35 साथी मारे गए थे। इस मुठभेड़ में गेंदालाल और ब्रह्मचारी पुलिस के हत्थे चढ़ गए। यह लोग इस समय ग्वालियर में एक जगह डकैती डालने जा रहे थे। तो इस तरह बागी बने। अब इस बारे में और जानकारी के लिए बागी लिंक पर मिलेंगी जानकारी। इंतजार कीजिए........नमस्कार।
बीहड़
बीहड़ चंबल और उसकी सहायक नदियों के कटान से बनी ऐसी भूमि जो अपने आश्रितों को हमेशा ही पनाह देता रहा है। उसमें रहने वालों के लिए यह सुखद अनूभूति है तो सभ्य कहे जाने वाले समाज के लिए एक सिहरन पैदा करने का कारक। कारण लगभग 6 लाख एकड़ भूमि पर फैले इस उवर्र मगर बंजर कंदराओं में ऐसी तमाम खोह और ठिकाने हैं जहां से सालों से बागी, दस्यु या फिर इन्हें डकैत कहें अपनी खौफ की दुनिया चलाते रहे हैं। कभी इस दुनिया का चेहरा ऐसा नहीं हुआ करता था। तब अपराध ने संगठित अपराध का ऐसा रूप नहीं लिया था। या कहे तब अपराध एक उद्योग की तरह विकसित नहीं था। फिर क्या था बीहड़ का चेहरा। कैसी रही उसकी दुनिया। बीहड़ क्यों बन गया इतना खौफनाक। जानना चाहते हैं तो रहे मेरे साथ।......लगातार। मैं आपको बताउंगा कि बागी,दस्यु और डकैत कहने और भावार्थ में एक शब्द होते हुए भी असल में कितने अलग हैं। अपने स्वभाव में, अपराध करने के अपने तरीके में, एक बागी एक दस्यू या फिर एक डकैत से कैसे भिन्न है। यह एक शब्द नहीं पूरा कालखंड है।
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