बीहड़ की दुनिया में आपका स्वागत है। नए सनसनी और संघर्ष की जानकारी

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

चुरकुट को पकड़ बता रहे दस्यु

धौलपुर पुलिस पांच हजार के एक ईनामी बदमाश रामवकीला को पकड़कर उसे दस्यु बता रही है। पुलिस की वाहवाही देखिए इस दस्यु से उसे एक देशी तमंचा और एक कारतूस मिला है। इसे पकड़ने के लिए जैसा कि पुलिस का कहन है उसे एडीएफ टीम प्रभारी महावीर सिंह बसई डांग थाना की फोर्स को साथ लेना पड़ा। कथित दस्यु की घेराबंदी भी की उसने भागने की कोशिश की तब कहीं बड़ी मुश्किल से उसे दबोचा जा सका।

रविवार, 23 नवंबर 2008

कौमेश गिरफ्तार


11 लाख के इनामी डकैत दस्यु जगन गुर्जर की साथी कौमेश को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुरैना पुलिस के साथ बीते दिनो हुई मुठभेड़ में कौमेश घायल हुई थी। वह धौलपुर के सरमथुरा के एक नर्सिंग होम में इलाज करा रही थी। यहीं से पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया। कौमेश अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए बीहड़ में कूदी थी। गुर्जर आंदोलन के दौरान वह आंदोलन को समर्थन देने को लेकर चर्चा में आई थी।

रविवार, 16 नवंबर 2008

बच निकला दस्यु जगन

11 लाख का इनामी और तीन राज्यों में वांछित दस्यु सरगना जगन गुर्जर शनिवार की रात ग्वालियर पुलिस से हुई मुठभेड़ में बच निकला। पुलिस को टाटा सूमो और कुछ हथियार ही मिल सके। अनुमान है कि मुठभेड़ में दो डकैतों को गोलियां लगी हैं। जगन गुर्जर के साथ महिला डकैत कोमेश गुर्जर भी थी। यह मुठभेड़ चिन्नौनी थाना क्षेत्र में हुई।

शनिवार, 15 नवंबर 2008

चुनाव में चहका बीहड़

पहली बार बीहड़ में एक नई पहल हो रही है। सदियों से दबे और आज भी हद तक पिछड़े लोगों में उत्तेजना है। इस उत्तेजना की वजह है चुनाव। मध्यप्रदेश में एक जिला है मुरैना। बीहड़ और बेहद जटिल परिस्थिति वाले इस जिले के पास ही है श्योपुर जिला। मुरैना को काटकर बनाए गए इस जिले में सहरिया आदिवासी की बड़ी संख्या है। यह जाति सदियों से पिछड़ी रही है। इसकी कई पीढ़ियों में तो ट्रेन देखी तक नहीं है। शहर में चलने और उठने बैठने का क्या कायदा होता है यह नहीं जानते। इसके कई लोग तो पुलिस के सिपाही को देखते ही अभी हाल तक भागते रहे हैं लेकिन लगता है अब हालात बदल रहे हैं। इस जिले की तहसील विजयपुर से भाजपा के टिकट पर पहली वार इस इलाके से कोई आदिवासी चुनाव लड़ रहा है और यह आदिवासी है सीताराम जो गर्व से अपने नाम के आगे आदिवासी लगाते हैं। यहां मुद्दा किसी पार्टी का नहीं है लेकिन मौजूदा हालात में जिस तरह सीताराम के साथ वहां का आदिवासी एकजुट हुआ है उसने जता दिया है कि सत्ता में आने की छटपटाहट उनके अंदर भी है। चिंता है तो सिर्फ इतनी कि यह छटपटाहट किसी वैचारिक स्तर या अपने हक को पाने की अकुलाहट के बजाए जाति के उसी विषैले समीकरण से पैदा हुई है जिसने मौजूदा राजनीति के परिदृश्य को नीलकंठी बना दिया है। कुछ भी हो लेकिन इससे आदिवासियों में राजनीति का स्वाद तो मिलेगा ही और देर से ही सही वह अच्छे बुरे की पहचान करेंगे। सीताराम आदिवासी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि सहरिया आदिवासियों में से चुनाव लड़ने वाले शायद वह पहले प्रत्याशी हैं जो किसी राष्ट्रीय पार्टी के टिकट पर चुनावन लड़ रहे हैं।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

जगन का करौली में डेरा

तीन राज्यों की पुलिस के लिए सिरदर्द बना दस्यु जगन गुर्जर ने इन दिनों राजस्थान के करौली जिले में डेरा डाल रखा है। बीहड़ सूत्रों के मुताबिक जगन ने अपना ठिकाना महावीर जी थाना क्षेत्र के तहत आने वाले कैमरी और खीमा का पुरा में बना लिया है। यहीं पर एक ग्रामीण की जीप से वह आवाजाही कर रहा है। पुलिस से छिपकर वह अपनी ताकत बढ़ाने में लगा हुआ है। इसके लिए वह हथियार और कारतूस खरीदने की फिराक में है। उसने अपने गिरोह को तीन हिस्सों में बांट रखा है। वह स्वयं दस्यु सुंदरी कौमेश के साथ है। दूसरे हिस्से की कमान उसके भाई पप्पू और पान सिंह के हाथ में है।

धौलपुर में दो दस्यु ढेर

धौलपुर पुलिस ने सरमथुरा इलाके में बुधवार सुबह हुई मुठभेड़ में दो इनामी दस्यु मुन्ना कंजर और बनियाराम मीणा को मार गिराया। भाग निकले दस्यु नारायन और निहाला की तलाश जारी है। मारे गए दस्यु खान इलाके में हत्या, चौथ वसूली और पुलिस पर हमला करने के आरोप में वांछित थे। उनके ऊपर दो-दो हजार का इनाम घोषित था। पुलिस ने इनके कब्जे से एक 306 बोर और एक 315 बोर की रायफल और करीब डेढ़ सौ कारतूस बरामद किए हैं। पुलिस की माने तो मारे गए दस्यु खैमरी गांव में अपने लिए हथियार और कारतूस खरीदने आए थे।

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

गुपचुप जारी है एक लड़ाई

देश के ह्रदयस्थल मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में है कूनो अभ्यारण। घने जंगल और पहाड़ों के बीच के गुजरती कूनो नदी अमेजन घाटी जैसा नजारा पैदा करती है। कभी यहा इलाका ग्वालियर स्टेट में आता था और पालपुर रियासत के अधीन था। यह इलाका वीरपुर तहसील के तहत आता है और यह सहरिया आदिवासी बाहुल्य है। आजादी से पहले यह इलाका सिधिंया और पापुलर राजाओं के लिए आखेट का प्रिय इलाका था। तब से लेकर आजादी के बहुत बाद तक इन आदिवासियों की ग्वालियर और पालपुर दोनों की रियासतों के उत्तराधिकारियों को लेकर श्रद्धा का भाव रहा। यह जंगल इन आदिवासियों के लिए सब कुछ है। राजाओं के शिकार के शौक के बाद भी इस इलाके में जंगल और जमीन बचे रहे। तमाम बाघ भी इस इलाके में थे। बाद में यह लुप्त हो गए। हाल ही के कुछ वर्षों में इसमें फिर बाघों को छोड़ा गया है और इस इलाके को अभ्यारण का मानक दिया गया है।इसी इलाके के आदिवासी इन दिनों बिना किसी मेधा पाटकर या बड़े नाम के अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। लड़ाई जंगल और जमीन बचाने की। इन आदिवासियों की लड़ाई मौजूदा सरकार से हो जो इन्हें जंगल से बेदखल कर चुकी है। अभ्यारण के बहाने आदिवासियों को उनके सदियों पुराने आवासों से बेदखल कर दिया गया है। सरकार ने यह काम बड़ी ही सफाई से किया है। आदिवासियों को पहले बेहतर जमीन और मुआवजा देने के बहाने जंगल से बाहर किया गया फिर उन्हें आवास के लिए मात्र 35 हजार रुपये और जमीन के नाम पर कुछ बीघा पथरीली जमीन दी गई। ऐसी जमीन जिस पर हल चलाना तो संभव है ही नहीं। अब यह आदिवासी इस ठगी से हतप्रभ हैं और उन्होंने अपने परंपरागत हथियार उठा लिए हैं। इस पर सरकार ने उनके मुकाबले पुलिस बल को उतार दिया है। कुछ महीने पहले ही इन आदिवासियों का पुलिस बल से टकराव हुआ। आदिवासियों ने पुलिस बल को लगभग घेर ही लिया। इसका बीडियो टेप मेरे पास है। जल्द ही सबके सामने लाया जाएगा।मगर सवाल यह है कि आदिवासी जीवन की यह जंग कम तक और कितनी लड़ पाएंगे। यह सवाल तब और मौजू है जब मी़डिया का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। मीडिया का इस तरफ ध्यान हो भी नहीं सकता। कारण यह इलाका इतने गहरे बीहड में है जहां जाने के लिए जिगर की जरूरत है जो कमोवेश अपने को तथाकथित धुरंधर कहने वाले कारपोरेट पत्रकार और सनसनी की दम पर नाम बटोरने वालों के पास तो नहीं हो सकता। दूसरे इन आदिवासियों के साथ मेधा पाटकर,अरूंधती राय जैसा नाम भी नहीं जुड़ा कि मीडिया टीआरपी बढ़ाने के लिए बावली हो जाए फिर आखिर इनके सवालों से कौन जूझेगा। कौन उन्हें पुशतैनी जमीन से बेदखल करने के अन्याय के खिलाफ लड़ी जा रही उनके हौंसले की लड़ाई में साथे देगा कौन....