बीहड़ की दुनिया में आपका स्वागत है। नए सनसनी और संघर्ष की जानकारी

रविवार, 17 अप्रैल 2011

घड़ियाल और डाल्फिन बचाने को जागा बोर्ड


पशु संरक्षण बोर्ड को आखिर चंबल में घड़ियाल और डाल्फिनों को बचाने की सुधि आ ही गई। नई जानकारी के मुताबिक बोर्ड ने चंबल नदी से सिंचाई और पीने के पानी के लिए शुरू की गईं नई परियोजनाओं पर रोक लगा दी है। ऐसा चंबल में पानी के गिरते स्तर के कारण किय गय है ताकि घड़ियाल और डाल्फिन के लिए संकट पैदा न हो। मध्य प्रदेश और राजस्थान की कई ऐसी परियोजनाओं का असर नदी के पानी पर पड़ रहा था। चंबल नदी से पानी उठाने के कारण उसका स्तर गिर रहा है। तीन साल पहले भी यहां लगभग 100 मगरमच्छ की मृत्यु हो गई थी.

पशु विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि चंबल का जल स्तर गिरने से मगरमच्छों की जान को खतरा पैदा हो गया है। इसलिए, उन्होंने इस तरह की सिफारिश की है।
राजस्थान सरकार ने हाल ही में धौलपुर के किनारे चंबल में पानी उठान के लिए एक संयंत्र लगाया है, लेकिन अब उसका भाग्य भी अधर में लटक गया है।

गुरुवार, 31 मार्च 2011

चंबल में लड़ मरेंगे डाल्फिन और घड़ियाल


चंबल नदी में पानी का स्तर चिंतनीय स्तर तक गिर गया है। क•ाी अपनी विशाल जल राशि से डराने वाली चंबल को इन दिनों लोग पैदल ही पार किए ले रहे हैं। सबसे बड़ा संकट डाल्फिन और घड़ियालों पर आने वाला है। डाल्फिन और घड़ियालों की चंबल में देश की एकमात्र सेंचुरी होने के कारण चिंता अधिक बढ़ गई है। मुरैना से विश्वजीत गोले की रिपोर्ट सा•ाार कल्पतरु एक्सप्रेस .. .. .. .. ..
विश्वजीत गोले
मुरैना। चंबल नदी में पानी का स्तर लगातार तेजी से कम हो रहा है। हालत यही रहे तो इस नदी में डाल्फिन और घड़ियालों के सामने •ोजन का संकट खड़ा हो जाएगा। वन्य प्राणी विशेषज्ञों को डर है कि इससे जलीय जीवों के बीच •ोजन के लिए जंग शुरू हो सकती है। इस संकट ने केंद्रीय वन मंत्रालय को •ाी संकट में डाल दिया है लेकिन समस्या से निपटने का उपाय अ•ाी किसी को नहीं सूझ रहा है।
वर्ष 2011 में की गई जलचरों की गणना में ऐसी स्थिति सामने आई है। चंबल के बीहड़ों को हिलाने वाले कुख्यात डकैतों को अपनी अथाह जलराशि से डराने वाली चंबल नदी, अब सूख रही है। जिसे सीधे शब्दों में कहें तो बांझ होती जा रही है। पानी कम होने से चंबल नदी में पलने वाले जलीय जीव मार्च माह में ही गहरे-गहरे गड्ढों में चले गए है। हर साल कम हो रहे पानी ने वन वि•ााग ही नहीं केन्द्रीय वन मंत्रालय तक को चिंता में डाल दिया है।
चंबल सेंचुरी में काम कर रही तमाम देशी व विदेशी स्वयं सेवी संस्थाएं तथा वन्य प्राणी विशेषज्ञ •ाी खासे चिंता में आ गए है। चंबल नदी का जलस्तर कैसे बढ़े अ•ाी फिलहाल इस संबंध में कोई निर्णय नहीं हुआ है। चंबल नदी में पानी की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सैकड़ों स्थानों पर नदी को पैदल ही पार किया जा सकता है। पानी कम होने की गति को देखते हुए, यह साफतौर पर झलकने लगा है कि महज दो वर्ष में ही चंबल नदी की जलधारा टूट जाएगी, और इसमें पलने वाले जलीय जीव डाल्फिन, मगर, कछुआ तथा विलुप्तप्राय घड़ियाल हमेशा के लिए यहां से खत्म हो जाएंगे।
चंबल नदी राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश की सीमा में बह रही है। चंबल नदी से राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में पानी की सप्लाई की जा रही है। जिसमें राजस्थान सरकार द्वारा तो •ाारी मात्रा में पानी का दोहन करने के लिए चंबल राजघाट पुल पर बकायदा अपने दो प्लांट लगा रखे हैं। जिनके जरिए हर रोज लाखों गैलन पानी निकाला जा रहा है। एक प्लांट से पानी थर्मल पावर प्लांट के लिए सप्लाई हो रहा है तो दूसरे से धौलपुर व •ारतपुर के लिए पानी •ोजा जा रहा है। चंबल नदी से अनेक नहर राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश क्षेत्र में आती है, जिनके जरिए से पानी को सिंचाई के लिए लिया जा रहा है। वन वि•ााग द्वारा जलचरों की गणना के लिए किए गए सर्वे के दौरान सवा पांच सौ किलोमीटर लंबी चंबल सेंचुरी में दो सैकड़ा से अधिक पुल मिले। इनमें से जलचरों के रहने लायक पुलों को छांटे तो वे 73 है। सर्वे में एक सैकड़ा से अधिक ऐसे स्थान मिले जहां चंबल नदी का पानी घुटनों से नीचे था तथा नदी को पैदल ही पार किया जा सकता है। पिछले पांच साल पूर्व की बात करें तो चंबल नदी में एक दर्जन स्थानों पर ही •ाीषण गर्मी के दिनों में चंबल नदी को पार किया जा सकता था, लेकिन कम होते जलस्तर ने इस संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि की है।

वर्जन बाक्स...
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प्रोजेक्ट फाइनल नहीं हुआ
"चंबल सेंचुरी में पानी हर साल तीव्र गति से कम हो रहा है। ये बहुत बड़ी चिंता का विषय है। पानी की कमी, •ाारी मात्रा में हो रहे दोहन से आई है। चंबल में पानी बढ़ाने पर प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि अ•ाी फिलहाल इस पर प्रोजेक्ट फाइनल नहीं हुआ है।"
आर.एस. सिकरवार
वन मंडलाधिकारी मुरैना

"सर्वे के दौरान चंबल नदी में पुलों की संख्या 73 मिली है। मगर, घड़ियाल तथा डाल्फिनों ने पुलों में पहुंचना शुरू कर दिया है। पुलों में इन्हें •ोजन संबंधी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। कमी होने पर टेरटरी बनाएंगें और तब तक इनके बीच •ोजन के लिए युद्ध की सं•ाावनाएं बढ़ जाती हैं।"
डॉ. ऋषिकेश शर्मा, वन्य प्राणी विशेषज्ञ
देवरी घड़ियाल ईको सेंटर मुरैना

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

निर्भय के जीवन पर फिल्म


यमुना नदी के बीहड़ों में बीहड़ फिल्म का मंचन इन दिनों चल रहा है। फिल्म का नाम मेरे ही ब्लाग पर बीहड़ ही है। इस फिल्म की शूटिंग का उद्घाटन शुक्रवार को औरैया के बीहड़ों में हाईकोर्ट के जज रवींद्र सिंह और कानपुर रेंज के आईजी ने किया। फिल्म डकैत निर्भर गुर्जर के जीवन पर आधारित है और इसमें निर्भय की भूमिका संजीव परिहार और सीमा परिहार की भूमिका में मुन्नी होंगी। इस फिल्म का निर्माण बुंडेड फिल्म बना चुके कृष्णा मिश्रा कर रहे हैं। संजय फिल्म गंगाजल में काम कर चुके हैं। शुक्रवार को निर्भय और सीमा की शादी का फिल्मांकन कर इसकी शुरुआत की गई।

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

दो घंटे फायरिंग फिर भी बच निकला

धौलपुर के बीहड़ में कुख्यात दस्यु पप्पू गुर्जर के साथ राजस्थान पुलिस ने दो घंटे गोलियां चलाईं फिर भी पूरा गिरोह बच निकला। पुलिस कप्तान धौलपुर कहते हैं कि गांव खनपुरा के पास बीहड़ में पुलिस ने गिरोह की घेराबंदी की गिरोह को समर्पण के लिए ललकारा पर क्या करे डकैतों ने गोली चलानी शुरू कर दिए और भाग गए। बड़े निष्ठुर निकले। कप्तान तक की नहीं सुनीं।

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

बीहड़ सुधार पर लालबुझक्कड़ी

आज इंडिया वाटर पोर्टल पर गया तो एक मजेदार जानकारी मिली। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को बीहड़ सुधार की याद आई है। उसने इसके लिए एक योजना भी तैयार की है। यानी बीहड़ को बेचने का बाकयदा प्लान तैयार कर लिया गया है। क्या है प्लान आइए जाने....

1971 में शुरू हुई केंद्र सरकार की योजना के अलावा केंद्र ने एक और बड़ा काम हाथ में लिया था। कई लोगों को यह जान कर अचरज होगा कि बीहड़ सुधार की यह योजना कृषि मंत्रालय की नहीं, गृह मंत्रालय की थी। उसकी निगाह में बीहड़ पर्यावरण की नहीं, डाकुओं की समस्या का केंद्र थे। कोई 500 से ज्यादा कुख्यात डाकू यहां तीन राज्यों (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान) की पुलिस को धता बताकर एक तरह से समानांतर सरकार चला रहे थे। 27 सालों में उस योजना पर कोई 1,224 करोड़ रुपये खर्च होने वाले थे। सात-सात साल के चार कालखंड बनाए गए थे। पहले खंड में तीनों राज्यों में कुल 55,000 हेक्टेयर नई जमीन खेती के लिए, 27,000 हेक्टेयर बाग-बगीचे के लिए और 27,500 हेक्टेयर वन संवर्धन और चरागाह के विकास के लिए जुटाने की बात थी। 2,20,000 हेक्टेयर ऊंची भूमि में मेड़बंदी, पानी की निकास नालियां और बीहड़ रोकने के बांध आदि का निर्णाण भी करना था।

पहले कालखंड में योजना पर 283.62 करोड़ रुपये खर्च होते और 3,273 इंजीनियरों, 11,376 कुशल कारीगरों और 2,40,00 से ज्यादा अकुशल मजदूरों को रोजगार मिलता। उससे कुल निवेश के 11 प्रतिशत की आय होती। लेकिन योजना लागू ही नहीं हुई। क्यों? 1972 में गांधीवादी कार्यकर्ताओं के अथक प्रयत्न से 500 से ज्यादा डाकुओं ने श्री जयप्रकाश नारायण के सामने मध्य प्रदेश में आत्मसमर्पण किया, इसलिए हो सकता है गृह मंत्रालय ने सोचा हो कि अब बीहड़ो को सुधारने की क्या जरूरत है।

1977-78 में मध्य प्रदेश सरकार ने बीहड़ सुधारने की और ऊंचाई वाली भूमि की सुरक्षा की एक योजना केंद्र सरकार को पेश की। उसमें भिंड, मुरैना, ग्वालियर, दतिया और छतरपुर के जलग्रहण क्षेत्र के एक लाख हेक्टेयर को सुधारने की बात थी। यह योजना भी नई दिल्ली के नेताओं और नौकरशाहों के बीहड़ों में भटक कर रह गई। 1979 में एक बार फिर बीहड़ सुधार योजना खटाई में पड़ी। मध्य प्रदेश सरकार ने भूमि-सुधार योजना को इसलिए रद्द कर दिया क्योंकि केंद्र सरकार के तत्वाधान में चलाई जा रही योजनाएं बंद कर दी गई थीं और सुधार में प्रति हेक्टेयर खर्च बहुत बढ़ चला था।

चंबल घाटी विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष श्री वी निगम के अनुसार बीहड़ सुधार के लिए सामान्य लाभ-हानि के नियम ठीक नहीं है। लागत का हिसाब दीर्घकालीन सामाजिक लाभों के आधार पर किया जाना चाहिए। श्री निगम के अनुसार पहले की योजनाओं के असफल होने का कारण यह है कि वे बहुत छोटी और छितरी हुई थीं और इन्हें एक समग्र रूप में देखने-समझने वाले लोगों की भी कमी थी। लागत का कोई ख्याल नहीं रखा गया और ज्यादातर योजनाओं के लागू होने में काफी देर की गई। फिर सुधारी गई जमीन की नीलामी बड़ी कड़ी शर्तों पर की जाने लगी तो गरीब किसानों की वहां तक पहुंच हो नहीं सकी। निजी प्रयास भी हो नहीं सके, क्योंकि बीहड़ सुधार के लिए सबसिडी की दरें बहुत कम थीं। किसानों को नलकूप बनाने के लिए तो 50 प्रतिशत खर्च और 3000 हजार रुपये तक की मदद मिलती थी, पर बीहड़ सुधार के लिए प्रति एकड़ सिर्फ 250 मिलते थे।

1966-67 में मध्य प्रदेश बन विभाग ने एक अलग भूमि संरक्षण विभाग स्थापित किया। इसको 1975 तक 12,000 हेक्टेयर जमीन सुधारने का काम दिया। लेकिन यह सारी जमीन राजस्व विभाग की परती जमीन थी इसलिए चराई और पेड़ो की छंटाई रोकी नहीं जा सकी क्योंकि उस पर केंद्रीय वन कानून लागू नहीं हो सकता था।

1980 में हवाई जहाज से बीज छिड़क कर वन लगाने की भी एक योजना बनी। इससे हर साल कोई 12,000 हेक्टेयर जंगल बढ़ाने की बात थी। 1980 में हवाई बुवाई तो की गई पर लक्ष्य पूरा नहीं हो सका।

चंबल घाटी विकास प्राधिकरण की परियोजना में वन संवर्धन शामिल नहीं था, फिर भी उसके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता था। परियोजना ने चंबल कमांड क्षेत्र के किनारे वाले बीहड़ों में 11,000 हेक्टेयर जमीन में पेड़ लगाने का सुझाव रखा था। पहले चरण में, लगभग 115 किलोमीटर के घेरे में मिट्टी का तटबंध बनाकर उसमें घास लगाई गई। उसके समानांतर निकास-नालियां बनाई गईं ताकि अलग-अलग दर्रों से होकर पानी नदी में जा मिल सके। पहले चरण में लगभग 23,000 हेक्टेयर खेती की जमीन को बीहड़ बनने से बचाया गया। दूसरे चरण में दूसरे 150 किलोमीटर परिधि में, जहां भूक्षरण की मात्रा ज्यादा है, वैसा ही काम किया जाना है। इस प्रकार 25,000 हेक्टेयर जमीन सुधर सकेगी।

पर इस बीच, बीहड़ बेरोक-टोक फैलता जा रहा है। इसके लिए सरकार को ही दोषी ठहराया जाएगा। परिस्थिति की अहमियत ठीक से समझने की शक्ति उसमें नहीं है। हाल में चंबल घाटी के विकास के लिए 2000 करोड़ रुपयों की एक योजना घोषित की गई थी, पर अभी ठीक-ठीक नहीं मालूम नहीं है कि वह केवल चुनावों को ध्यान में रखकर ही तो नहीं की गई थी। पिछले अनुभव से अब कोई ज्यादा उम्मीद नहीं बनती है।

इनामी डकैत राजनारायण पंडित मारा गया

केनरा परियोजना के इंजीनियर सहित छह लोगों का अपहरण कर चर्चित हुआ राजनारायण गैंग का सरगना भिंड की देहात पुलिस ने मार गिराया। उस पर 25 हजरा रुपए का इनाम था। गुरुवार तड़के हुए मुठभेड़ में पुलिस ने उसे मार गिराया। यह डकैत दो साल पहले उस समय चर्चा में आया जब उसने भिंड जिले केनरा परियोजना से छह लोगों का अपहरण कर लिया। आगरा जिले के थाना खेडा राठौड़ के गांव सिमराई निवासी इस डकैत के एक भाई रामनारायण पंडित को ग्वालियर की पुलिस कैंसर पहाड़िया पर पहले ही ढेर कर चुकी है। यह भी इनामी बदमाश था। गुरुवार को भिंड पुलिस को राजनारायण के कछपुरा गांव में आने की सूचना मिली। पुलिस ने घेराबंदी कर उसे मार गिराया। उसके पास से एक माऊजर और 80 कारतूस बरामद किए गए।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

सुल्ताना के बारे में पूरी कथा जल्द

बहुत दिन से बीहड़ के बारे में कुछ नहीं लिख सका हूं। हालांकि इस बीच बीहड़ शांत रहा हो ऐसा कुछ भी नहीं। आगरा में जगन गुर्जर के भाइयों की दहशत के साथ ग्वालियर में नवोदित गैंग और छोटे मोटे गिरोह के अपहरण की घटनाओं में शामिल होने के समाचार मिलते रहे, लेकिन इस सबके बारे में नहीं लिख सका। कारण सुल्ताना डाकू के बारे में अभी हालत में हुए अध्ययन से कुछ नई बाते निकल कर सामने आई। मसलन सुल्ताना के बेटे को उसी अंग्रेज कप्तान ने पाल पोस कर बड़ा किया जिसने सुल्ताना को गिरफ्तार किया था। सुल्ताना के बारे में पूरी कथा जल्द ही आप लोगों के सामने होगी।